अगर कोई किसी पुत्री के अधिकार को नहीं देवे, सांसारिक जीवन में कोई किसी की जिंदगी में आने वाला नहीं है, तो पुत्री के अधिकारों की रक्षा के लिए हैं धर्म में क्या प्रावधान है, अगर कोर्ट से नयन नहीं मिला तो उसका और उसके साथ अन्याय करने वाले का क्या होगा
क्योंकि आप धर्म के भीतर ही प्रश्न पूछ रहे हैं, Jain धर्म के सामान्य विश्वास के अनुसार पुत्री/महिला के अधिकार और अन्याय के उपाय इस प्रकार समझे जाते हैं:
- स्त्री के अधिकार का temel रूप: Jain परंपरा में शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों में स्त्री-पुरुष के बीच समानता का उच्च मान माना गया है। महावीर के समय सेWomen को शिक्षा और धार्मिक जीवन में समान अवसर दिए जाने की परंपरा प्रमुख है। दोनों संप्रदायों (Digambar और Śvetāmbara) में धार्मिक और सांसारिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन दिया गया है; मुख्य बात यह है कि स्त्री की आत्मा उन्नति और मोक्ष के लिए अवसर बराबर हैं। अलग-अलग स्थानों पर कभी-कभी नियम-संयोजन में भी भिन्नता देखने को मिलती है, पर pūrv-परंपरा का मूल उद्देश्य स्त्री की गरिमा और शिक्षा-योग्यता बनाए रखना है।
- संपत्ति/विरासत के अधिकार: Jain कानून में महिलाओं के विरासत प्राप्ति के अधिकार पर विस्तृत चर्चा है। प्रायः कहा गया है कि स्त्री को विरासत में हिस्सा मिलना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर वह सम्पत्ति स्वतंत्र रूप से संचालित कर सकती है; पिता की मृत्यु के बाद स्त्री के अधिकारों को आदर दिया गया है, और अगर पति के बिना पुत्र हुए, तो स्त्री को या विधवाओं को विरासत का कुछ भाग प्राप्त होता है। यह हिंदू विधि से भिन्न है, जिसमें धृत बेटी-वंश विरासत में बराबर कदम नहीं मानते थे। कुल मिलाकर, Jain परंपरा में स्त्री का अधिकार और संपत्ति-स्वामित्व का दर्शन पुरुषों के समान नहीं होता है, पर उसे पारंपरिक रूप से अधिक स्वायत्तता दी गई है और मोक्ष-मार्ग के लिए आवश्यक शिक्षा-योग्यता भी प्रबल मानी जाती है। नोट: Digambar और Śvetāmbara में इन मुद्दों पर कुछ छोटे नियम भिन्न दिखते हैं, लेकिन मूल विचार स्त्री की समान धार्मिक मूल्य और संपत्ति-स्वामित्व की स्वतंत्रता है।
- कोर्ट/न्याय और अन्याय का परिणाम: यदि किसी स्त्री के अधिकार के वेग में कोर्ट से समाधान नहीं मिलता, Jain धर्म में धर्म-आचार, सत्य और अहिंसा का मार्ग ही प्रमुख है—क्योंकि Jain शिक्षा में हिंसा से परहेज और सत्य के साथ न्याय पाने की कोशिश सर्वोपरि है। व्यवहारिक रूप से समाज-व्यवस्था में राज्य कानून ही सर्वप्रथम उपाय हैं, पर धार्मिक दृष्टि से अन्याय के परिणाम का कटाक्ष कर्म-फल के रूप में जीवन-पथ पर होता है; अन्य शब्दों में, गलत करने वाले के कर्मों में बंधन बनते हैं। गैर-कानूनी या अन्यायपूर्ण कदम उठाने की Jain सलाह नहीं देती; धर्म शांति, धैर्य और नैतिक आचरण के साथ उचित रास्ते अपनाने की सीख देता है।
- व्यवहारिक सुझाव (संक्षेप):
अगर चाहें, मैं आपके प्रश्न के संदर्भ में Digambar और Śvetāmbara दोनों पक्षों के विशिष्ट प्रावधानों के बारे में सरल-सरलीकृत differences भी बता सकता हूं।