हर जीव समान है: जैन धर्म हर प्राणी में अहिंसा और समानता की मान्यता रखता है। किसी भी तरह की दमन-निंदा स्वीकार्य नहीं है। तो सभी जैन अपने आपको उच्च कुल और दूसरे धर्म के लोगों को विधर्मी कहना की शास्त्र या ग्रंथ से है,
संक्षेप में उत्तर ये है:
- जैन धर्म का मूल नीतिमंत्र अहिंसा और सभी जीवों के प्रति समान व्यवहार है. हर जीव आत्मा है, उसकी क़ीमत है और मोक्ष पाने की क्षमता है. यह “समानता” और “परस्पर सहायता” पर जोर देता है.
- Jain शास्त्रों में दूसरों के प्रति ऊँच-नीच की भावना या किसी दूसरे धर्म के लोगों को विधर्मी कहकर असम्मानित करने का अनुमोदन नहीं है. असल में अहिंसा, सत्य, और दुर्बल-शोषण से बचना इस धर्म की प्रमुख शिक्षा है.
- कई महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं जो समान विचारों को बढ़ाते हैं, जैसे:
- दो प्रमुख संप्रदाय (Digambar और Shwetambar) के बीच भी इस बात में अधिकतम समानता है कि धार्मिक आस्थाओं के लिहाज़ से सभी जीवों को समान माना जाता है; किसी भी श्रेष्ठता-या दमन की गाथा शास्त्रों में सामान्यतः समर्थित नहीं है. जहाँ कुछ सामाजिक-वस्तुनिष्ठ रीतियाँ चलीं, वे धर्म के मूल सिद्धांत नहीं बनतीं—और ऐसे मामलों में धर्म के वास्तविक मूल्यों को ही प्राथमिकता दी जाती है.
संक्षेप: जैन शास्त्र और धर्म-संस्थाओं का लक्ष्य सभी जीवों के प्रति करुणा, अहिंसा और समान सम्मान बनाये रखना है; दूसरों को नीचा दिखाने या विधर्मी कहकर निंदा करने की शास्त्रीय अनुमति नहीं है.