प्रशासनिक और न्यायिक अलग रखे, वो तो हर भारतीय के लिए हैं, लेकिन समाज में ऐसा न हो उसके लिए जैन धर्म में क्या नियम हैं, और किस शास्त्र से लिए है, reply छोटा पर सीधा हो
संक्षेप में जवाब:
- Jain धर्म में प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था को तो समाज के लिए जरूरी मानते हैं, पर उसका संचालन अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे नैतिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। ये मूल बातें layperson के लिए भी guiding principles हैं, ताकि समाज में हिंसा, चोरी और अत्याचार कम हों।
- क्या नियम हैं (मुख्य पिलर):
- अहिंसा (Non-violence): सभी जीवों के प्रति करुणा और हिंसा से बचना।
- सत्य (Truth): सच बोलना और असत्य-प्रचार से बचना।
- अस्तेय (Non-stealing): चोरी-चंदेरी, धोखा-धरी नहीं।
- ब्रह्मचर्य (Chastity/Correct conduct): विशेषकर युवाओं-युवतियों के संबंधों में संयम।
- अपरिग्रह (Non-attachment): अनावश्यक संग्रह और दुरुपयोग से बचना।
- इन सभी का सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर पालन حکومت और नागरिक दोनों के लिए आदर्श है।
- ये नियम किन शास्त्रों से हैं:
- महावीर के शिक्षाओं पर आधारित जैन द्रष्टांतों में राजधर्म और lay-ethical conduct का सार प्रकट होता है: अहिंसा, सत्य, आदि पर विशेष बल। Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं में इन नैतिक मूल्यों की भूमिका समान है, पर उद्धरण-शास्त्रों के पाठ में छोटे-छोटे शब्दों का भेद हो सकता है।
- कौन से लोग या भूमिकाएं प्रभावित हैं:
- राजा/प्रशासन: हिंसा-न्याय-धर्म के संतुलन के साथ शासन करने चाहिए, सभी जीवों का कल्याण ध्यान में रखकर।
- नागरिक/ग्रामजन: अपने आचार-व्यवहार से सामुदायिक शुद्धि और शांतिपूर्ण सामाजिक जीवन बनाएं।
- Jain विचारधारा में सामाजिक शांति के लिए प्रशासनिक-न्यायिक व्यवस्था को नैतिक सीमाओं के भीतर चलना जरूरी माना गया है। ज्यादातर बातें सम्यक्त्व (सत्य-श्रद्धा-आचार) और उपरोक्त पंच-शील पर केंद्रित हैं।
अगर चाहें, मैं संक्षेप में Digambar बनाम Shwetambar के कुछ उल्लेखित शब्दों या उद्धरणों के अंतर भी स्पष्ट कर दूँ।