पंचम औरे में भव्य जीवों को नीरनेका उत्तम साधन क्या
जैन धर्म के अनुसार पंचम काल (पंचम आरो) में भव्य जीवों के लिए मोक्ष प्राप्ति (निर्याण) का सर्वोत्तम साधन सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र का पालन करना है। पंचम काल में तीर्थंकरों का जन्म नहीं होता, अतः केवल शुद्ध केवली सम्यग्दर्शन और चारित्र का उपदेश नहीं देते। फिर भी, भव्य जीवों के लिए श्रवकाचार (गृहस्थ धर्म) का पालन, अणुव्रत, गुणव्रत, शीलव्रत, संयम, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, और सच्चे साधुओं का संग सबसे उत्तम साधन माने गए हैं।
पंचम काल में मुख्य रूप से चारित्र मोहनीय कर्म की निर्जरा (क्षय) के लिए—
- सम्यक् दर्शन (सच्चे धर्म, गुरु, और देव में श्रद्धा)
- स्वाध्याय (अध्ययन एवं मनन)
- प्रतिक्रमण (पश्चाताप एवं आत्मचिंतन)
- मित आहार (संयमित भोजन)
- सत्संग (सच्चे साधुओं का संग)
- अणुव्रतों का पालन
- ध्यान और प्रतिक्रमण
पंचम काल में केवल मोक्ष का मार्ग कठिन है, किंतु यदि जीव भव्य है और दृढ़ साधना करे तो अगले (छठे) काल के पहले मोक्ष संभव है। शास्त्रों के अनुसार, अभी भी सम्यक् दर्शन प्राप्ति और शुद्ध चारित्र का पालन ही भव्य जीवों का सबसे उत्तम साधन है।