प्रश्न 4 :- तीर्थकर को क्या नही होता है आहार होने के बाद भी ?
संक्षेप में: तीर्थंकरों को आहार के बाद भी भूख-तृषा जैसी कड़ियाँ नहीं रहतीं। वे चारों ओर से निश्चल रहते हैं और उनके मन-वचन-कर्म शुद्ध रहते हैं, इसलिए भोजन के बाद भी राग-द्वेष या अवध्य इच्छा नहीं उठती।
स्पष्ट करके:
- वे भोजन के बाद भी सामान्य भूख-अनुभव नहीं करते; आहार केवल शरीर Chrys के लिए आवश्यक ऊर्जा के स्रोत की भूमिका निभाता है, न कि इच्छाओं को जगाने का।
- उनके भीतर से तृष्णा, लालच, क्रोध आदि कषायें दूर रहती हैं, इसलिए भोजन के बाद भी आत्म-नियंत्रण कायम रहता है।
- जहाँ तक साधना-स्थिति का प्रश्न है, कई जगह Digambar और Shwetambar परंपराओं में छोटे-छोटे विविध उदाहरण मिलते हैं, पर मूल अर्थ यही है कि तीर्थंकरों के आहार के बाद भी वे कषाय-मोह से मुक्त रहते हैं।
यदि आप चाहें तो मैं इस विषय पर Digambar बनाम Shwetambar दर्षनों में जो भिन्नता बताई जाती है, उसे सरल शब्दों में भी समझाकर दे दूँ।