युद्ध में हाथी पर बैठे-बैठे किस राजा ने केशलोच किया था ?
केशलोचन (केशलोच) एक तपस्या-पूर्वक शृंगार नहीं, बल्कि शास्त्रानुसार दिगंबर संन्यासियों द्वारा अपने केशों की जड़ से उखाड़ कर आत्म-त्याग और वैराग्य दिखाने की कठिन साधना है। Jain ग्रंथों में यह देव-यात्रा नहीं, बल्कि साधु-साध्वी के आचार-व्यवहार का भाग है; इसे राजाओं या युद्ध-स्थिति में हाथी पर बैठे हुए करने का रिकॉर्ड सामान्य रूप से नहीं मिलता।
- मुख्य बात: केशलोच साधु-संस्कार/दीक्षा के समय और अन्य अवसरों पर किया जाता है; वृत-उपवास के साथ भी प्रचलित है.
- Digambar और Shwetambar परंपराओं में इसकी भूमिका और अभ्यास में थोड़ा-बहुत भिन्नता मिलती है, लेकिन मूल विचार आत्म-त्याग और ममत्व 제거 का ही रहता है.
नीचे उसी से संबंधित एक स्पष्ट स्रोत है:
यदि आप चाहें तो मैं इसी विषय पर Digambar और Shwetambar ग्रंथों की अलग-अलग व्याख्याओं के सरल सार भी दे सकता हूँ।