साधू कितने दोषो के टालकर आहार ग्रहण करते है ?
संक्षेप में जवाब یہ ہے:
- साधु आहार ग्रहण करने से पहले “कितने दोष” टालते हैं, इसका कोई фикс संख्या Jain धर्म में नहीं दी गयी है। अनुष्ठान और आचार-विधान का मूल उद्देश्य है अहिंसा, सत्य, अछोरचोरी नहीं, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे पाँच महाव्रतों की कड़ाई से पालना करना, ताकि जीवों को अनावश्यक हानि न पहुँचे।
- सच्चे अर्थ में भोजन संबंधी नियम मुख्यतः इन पाँच महाव्रतों के साथ जुड़े और ट्रेड-फार्म (आहार-विधि) के रूप में आते हैं: आहार लेने की समय-सीमा, क्या-क्या भोजन स्वीकार्य है, और किस प्रकार के कर्मों से बचना है—ये सब इन नियमों के दायरे में रहते हैं।
- Digambar और Śvetāmbar दोनों ही परंपराओं में भोजन-विधि के कुछ अलग उदाहरण मिलते हैं (जैसे कौन से प्रकार के पकवान, कब तक भोजन, आदि के नियम). पर मूल उद्देश्य एक ही है: हिंसा से बचना, अनावश्यक दुख से बचना, और साधना को स्थिर रखना।
अगर आप चाहें, मैं इन दोनों परंपराओं के भोजन-नियमों के विशेष बिंदु (Digambar बनाम Śvetāmbar) अलग-थलग समझाकर दे सकता हूँ।