Please give me Sakaltirth sutra
Sakala Tirtha Vandana (Sakāl Tīrtha Vandanā Sūtra) is a stotra used to pay obeisance to all eternal (Shāsvat) and non-eternal (Ashāsvat) temples, as well as to the images of Tirthankaras and other revered beings during Jain Pratikraman.
Original text (extract from the sutra as it appears in Jain sources):
- सकल तीर्थ वंदुं कर जोड,
- जिनवर नामे मंगल क्रोड
- पहेले स्वर्गे लाख बत्रीश,
- जिनवर चैत्य नमुं निश-दिश
- 1
- बीजे लाख अट्ठावीश कह्यां,
- त्रीजे बार लाख सद्दह्यां
- चोथे स्वर्गे अड लख धार,
- पांचमे वंदुं लाख ज चार
- 2
- छट्ठे स्वर्गे सहस पचास,
- सातमे चालीस सहस प्रासाद
- आठमे स्वर्गे छ हजार,
- नव दशमे वंदुं शत चार
- 3
- अगियार बारमे त्रणसें सार,
- नव ग्रैवेयके त्रणसें अढार
- पांच अनुत्तर सर्वे मळी,
- लाख चोराशी अधिकां वळी
- 4
- सहस सत्ताणুं त्रेवीस सार,
- जिनवर भवन तणो अधिकार
- लांबां सो जोजन विस्तार,
- पचास ऊंचां बहोंतेर धार
- 5
- एक सो एंशी बिंब प्रमाण,
- सभा सहित एक चैत्ये जाण
- सो क्रोड बावन क्रोड संभाल,
- लाख चोराणुं सहस चौंआल
- 6
- सातसें उपर साठ विशाल,
- सवि बिंब प्रणमुं त्रण काल
- सात क्रोड ने बहोंतेर लाख,
- भवनपतिमां देवळ भाख
- 7
- एक सो एंशी बिंब प्रमाण,
- एक एक चैत्ये संख्या जाण
- तेरसें क्रोड नेव्यासी क्रोड,
- साठ लाख वंदुं कर जोड
- 8
- बत्रीससें ने ओगणसाठ,
- …
Note: यह पाठ विविध cadences/अपठित रूपों में कभी-कभी छोटे बदलावों के साथ गाया और पढ़ा जाता है, पर मूल भाव एक ही है: सभी तीर्थों- temples, Tirthankaras की पूजा, और धर्म-संतों के प्रतीक-चिह्नों के प्रति सम्मान.
Meaning (arth) based on Jain tradition:
- सभी तीर्थों, उनके कल्पित/अनंत (शाश्वत) और इष्ट/अनंत नहीं (अशाश्वत) स्थलों का सम्मान और वंदना करना।
- जीवों के उद्धार के लिए तिथार्थों के नामों, चैत्यों और उनके अवतारों, साथ ही देवों और आचार्यों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना।
- आत्म-शुद्धि, संयम, और धर्म-प्रचार का संकल्प लेकर जीवन को सही दिशा देना।
Digambar vs. Shwetambar: मूल भाव और प्रयोजन समान रहते हैं; इस स्तोत्र के पाठ में कुछ क्षेत्रीय/परंपरागत उच्चारण या क्रम में सूक्ष्म भिन्नताएं मिल सकती हैं, पर आस्वादन-उद्देश्य एक ही है: प्रायः प्रतिक्रमण के समय सभी तीर्थों और प्रमुख देव-आचार्यों को श्रद्धांजलि।
अगर आप चाहें, मैं इस Sutra का और भी विस्तृत अर्थ-व्याख्या और Pratikraman में इसकी जगह के बारे में बता दूँ।
पढ़ने के लिए आगे का एक विश्वसनीय पाठ: