Gyarah pratima ka kya arth hai
Gyarah pratima का अर्थ है Shrāvako (lay follower) के द्वारा धर्म-जीवन में उठे जाने वाले 11 क्रमबद्ध चरण (pratima)।
11 pratima वे कदम हैं जिनसे एक गृहस्थ धीरे-धीरे अधिक तप और आत्म-सम्पादन की दिशा में बढ़ता है. इन pratima के अनुसार एक व्यक्ति पहले दर्शन (विश्वास-आस्थ), व्रत, साधारण-ध्यान आदि से शुरू करके धीरे-धीरे अधिक अनुशासन और संकल्प लेता है, ताकि eventually muni (संन्यासी) बनने जैसी स्थिति तक पहुँच सके।
इन 11 pratima के नाम और सारಾಶ:
1) Darśana Pratimā (दर्शन प्रतिमा) – सही दृष्टिकोण और धर्म-विश्वास विकसित करना; गुरु-शास्त्र की पूजा और बुरी अच्छाइयों से दूर रहना। 2) Vrata Pratimā (व्रत प्रतिमा) – guna vrats और śikṣā vrats सहित बारह व्रतों को अपनाना। 3) Sāmāyika Pratimā (सामायिक प्रतिमा) – नियमित ध्यान/सामायिक करना। 4) Poṣadh Pratimā (प्रोषध/पोषध प्रतिमा) – पर्वों के दिनों में धैर्यपूर्वक उपवास/धर्म-स्थान में रहना। 5) Sacitta Tyāga Pratimā (सचित्त-त्याग प्रतिमा) – सचित्त (भोग) से त्याग और कुछ खाद्य-आहारों से परहेज। 6) Rātribhukti Tyāga Pratimā (रात्रिभुक्ति-त्याग प्रतिमा) – रात भोजन से बचना और दिन में सहज व्यवहार निभाना। 7) Brahmacharya Pratimā (ब्रह्मचर्य प्रतिमा) – संयमित जीवन, मैथुन-व्यवहार से दूरी। 8) Arambha Tyāga Pratimā (आरंभत्याग प्रतिमा) – हिंसा-युक्त कर्मों से त्याग; आचरण-शास्त्र के अनुसार चलना। 9) Parigraha Tyāga Pratimā (परिग्रह Tyāga प्रतिमा) – वस्तुओं का त्याग/कम possessions रखना। 10) Anumati Tyāga Pratimā (अनुमतित्याग प्रतिमा) – पाप-कार्य के उपदेश-प्रसार से दूरी बनाकर समय-समय पर अनुमति/उद्धार से दूर रहना (यानी सलाह देना कम करना)। 11) Uddishta Tyāga Pratimā (उद्दिष्टत्याग प्रतिमा) – केवल वह भोजन आदि स्वीकारना जो किसी ने आपको पहले से दिया हो; अपने लिए बनाए गए भोजन से दूरी।
इन 11 pratima के बाद 12वीं प्रतिमा मुनिराज की होती है, जो पूरी रत्नत्रय (गीता-गुण-आचार) पालन करके मोक्ष-सुख को प्राप्त करते हैं।
Digambar और Shwetambar परिभाषा में अंतर:
- दोनों ही दिशाओं में यह 11 चरण मान्य हैं, पर उनका महत्व और व्याख्या कुछ जगह अलग बैठती है. Digambar पर इन प्रतिमाओं को अधिक ठोस क्रम और संन्यास-उन्मुख मार्ग के रूप में देखा जाता है, जबकि Shwetambar में इन्हें गृहस्थ जीवन से मोक्ष-उन्मुख विकास के मार्ग की तरक्की के रूप में भी समझा जाता है. पर उद्देश्य—आत्म-शुद्धि, संयम और मोक्ष-प्राप्ति—एक समान रहता है।