निगोद के प्राप्ति के कारण
निगोद प्राप्ति के कारण
- निगोद वह निचला जीव-स्तर है जहाँ अनेक जीव एक ही द्रव्य-समूह में रहते हैं; यह जन्म-आदि कर्मों के कारण होता है। निगोद में रहने वाले जीव बहुत कम आयाम के साथ होते हैं और इनकी प्राप्ति सीधे कर्मों के फलों से जुड़ी है। मुख्यतः कर्मों के कारण ही किसी जीव की निगोद-स्थिति बनती है। ( jainworld.jainworld.com, pub-ucpec2-prd.cdlib.org)
- व्यापक रूप से Jain शिक्षा में कहा गया है कि जन्मों के लिए बंधन के कारक मुख्यतः मिथ्यात्व (अज्ञान/भ्रम), अविरति (व्रत-त्याग), प्रमाद (लापरवाही), काशय (प्यास/अपेक्षा-क्रोध). ये कारण ही जीव को बार-बार जन्म-जरूरी कर्मों में फंसा लेते हैं और परिणामस्वरूप निगोद जैसी अवस्थाओं में पहुँचाते हैं। एक ही कर्म-श्रेणी के फल से निगोद बनना संभव है, लेकिन मोक्ष के लिए मानव जन्म ही मार्ग है। ( en.wikipedia.org)
- निगोद में जन्म होते रहने का एक कारण यह भी बताया गया है कि अवशिष्ट कर्म-फलों के कारण पदार्थ-समुदाय में बहुत छोटे-छोटे जीवन रहते हैं, जिनमें से कुछ Itara Nigod (परिणामस्वरूप न जारी) भी होते हैं। इनमें से कुछ जीव अपने कर्मों के फल से बार-बार निगोद में रहते हैं, और इसी क्रम में आगे बढ़कर अन्य अवस्थाओं में जा सकते हैं। ( jainbelief.com, pub-ucpec2-prd.cdlib.org)
नोट: निगोद का वास्तविक उद्देश्य, मोक्ष के मार्ग के लिए मानव जन्म को प्राथमिक माना गया है। निगोद एक निम्न अवस्था है जिसे छोड़ना कठिन होता है क्योंकि इसमें बंधनकारी कर्मों का प्रभाव रहता है। अगर चाहें तो आप इसी विषय पर जैन-व्याख्या से संबंधित स्पष्टीकरण पढ़ सकते हैं