पांच मेरू वन
पांच मेरू (Panch Meru) जैन धरमशास्त्रों में Cosmology (लोक-संयोजन) के भाग के रूप में आता है. यहाँ मेरू पर्वत केंद्र में स्थित मान्या जाता है और उसके चारों ओर जंबूद्वीप जैसी महाविभाजित भू-रेखाएँ बताई जाती हैं. “पंच” का मतलब वहाँ पाँच मेरुओं से है जो केंद्र मेरू के चारों ओर स्थित मानी जाती हैं और इनके साथ महाभूमि/खंड ( continents/regions ) का वर्णन जुड़ा होता है. इन सभी की कथा-व्यवस्था जैन कल्पना के अनुसार जगत की संरचना समझाने के लिए है.
- central Meru (Sumeru) लोक-स्तर काAxis है।
- इसके चारों ओर जंबूद्वीप जैसे महाकाय भू-खंड और अन्य द्वीप-खंड बताए जाते हैं।
- पञ्च मेरू की कथा की विवरणिका प्रमुख जैन ग्रंथों में मिलती है, पर Digambar और Śvetāmbar जैसे दो मत-परंपराओं में कुछ स्थानों पर विवरण भिन्न हो सकता है।
- इस विषय पर विस्तृत विवरण Mahapurāṇa, Trilokaprajñapti आदि ग्रंथों में मिलता है; और आधुनिक प्रस्तुतियों में भी Jain cosmology के चित्रण मिलते हैं।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय के मूल शास्त्र-उद्धरणों ( Arth ) और Digambar/Śvetāmbar दोनों पर अलग-अलग बातों को सरल शब्दों में समझा दूँ। इसके लिए मैं JainKnowledge की संबंधित पन्नों की जानकारी भी दे दूँगा अगर वहाँ स्पष्ट लेख है।