Ji ka mishr bhav kahan ka Karan Hai sansar ka moksh ka ki kahin ka nahin
संस्कार संसार (संसार) का मूल कारण जीवात्मा की काम- क्रोध-लोभ-मैथुन आदि अत्यंत भावनाओं से karmic बंधन लग जाना है। जब जीव अहंकार और इच्छाओं में डूबा रहता है, तब प्राप्त कर्म (पुण्य-अप पुण्य) शरीर-मन-क्रिया के साथ जमा होते रहते हैं और वह चक्र टूटने वाला नहीं बनता—यही संसार का कारण बनता है।
moksha (मोक्ष) कैसे होता है?
- मोक्ष तब संभव है जब सभी कर्मों का सफाया हो जाए। इसे “कर्म-बंधन से मुक्त होना” कहा जाता है।
- यह तब संभव होता है जब जीव ज्ञान, दर्शन और आचरण तीनों के उचित मार्ग पर चलता है: सही विश्वास (सम्यग दृष्टि/सम्यग ज्ञान), सही ज्ञान (सम्यग ज्ञान) और सही आचरण (सम्यगाचरण)।
- इसके अलावा चार्वीय नहीं, बल्कि जैन धर्म के पाँच Mahavratas/अनुशासन, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि आचरणों के पालन से धीरे-धीरे कर्मो के बंधन कम होते-खत्म होते हैं।
- अंततः जीव अपने सभी कर्तव्य-भरोसे मुक्त होकर एक शुद्ध, सत ख्यालसी चैतन्य अवस्था तक पहुँचता है जिसे मोक्ष कहा जाता है।
Digambar बनाम Shwetambar के बीच मत-भिन्नताएं:
- प्रमुख सिद्धांत वही रहता है: जीवात्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
- गैर-आचार-व्यवहार और साधना के तरीकों में सूक्ष्म भिन्नताएं हो सकती हैं (जैसे साधुओं के वस्त्र-आचार, certain तत्त्वों का पाठ), पर मोक्ष की मूल धारणा दोनों संप्रदायों में समान है।
अगर आप अपनी बात “मिश्र भाव” या किसी खास प्रश्न के साथ मुझे और स्पष्ट करना चाहें, तो मैं उसी शब्द-स्थिति के अनुसार सरल, सही और स्पष्ट उत्तर दूँगा।