मिश्र भाव क्या है
मिश्र भाव क्या है
- मिश्र भाव का अर्थ है “मिश्रित या मिलीजुली प्रकृति” वाला भाव। इसे आत्मा के उन स्थितियों में समझा जाता है जहाँ दिल-ज्ञान-चरित्र आदि में सही और गलत दोनों की झलक रहती है।
- खास तौर पर यह कशयोपशामिका (mixed-desire) प्रवृत्ति से जुड़ा है: सही और गलत विश्वास, सही और गलत ज्ञान, सही और गलत दृष्टि आदि का एक साथ आना।
- जैन सिद्धांतों में मिश्र भाव को कश्योपशामिका भव में गिना गया है, जो पाँच भवों (आउप्षमिक, क्षयिक, मिश्र, औद्यिक, परिनामिक) में से “मिश्र” प्रकार है। इसके अंतर्गत 21 प्रकार के मिश्र भाव आते हैं, जैसे 4 प्रकार के ज्ञाना (मैती ज्ञान, श्रुति ज्ञान, अवधी ज्ञान, मनः प्रकृत ज्ञान), 3 प्रकार के अज्ञान (कुमती,kusurut, कुआवधी), 3 प्रकार के प्रकारण (चक्षुस दर्शन आदि), 5 लाभ-लाभाएँ (दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य) आदि व अन्य मिश्रित आचरण।
- यह mohaniya कर्म के कारण होता है; आत्मा कभी-कभी सही मार्ग पर ही होती है पर मोह-आकर्षण के कारण गलत आचरण-विश्वास की दिशा में फँस जाती है।
- Digambar और Shwetambar परंपराओं में मतभेद बहुत अधिक नहीं है; दोनों में मिश्र भाव के मूल अर्थ और его स्थान (कश्योपशामिका भव) समान माना गया है, बस पाठ/सूत्रावलियों में शब्द-सूचियाँ अलग हो सकती हैं।
अगर आपको मिश्र भाव के बारे में किसी खास शास्त्र का शब्द-तत्पर्य (उदा. तत्त्वार्थसूत्र, तत्त्वज्ञान पाठ) चाहिए तो बता दें; मैं वही के अनुरूप स्पष्ट अर्थ पेश कर दूँगा।