जीव का गुण और जीव का उपयोग तत्वार्थ सूत्र के अकॉर्डिंग क्या एक ही मतलब है
संक्षेप में: नहीं, “जीव के गुण” और “जीव का उपयोग” दोनों एक ही बात नहीं हैं, यह tatvarthasutra के अनुसार भी अलग-अलग विचार हैं।
- जीव के गुण (guna): यह जीव की आंतरिक, स्थायी खासियतें हैं—जैविक चैतन्य, ज्ञान, द्रष्टि, मनोभाव आदि के संकेत—जो जीव की प्रकृति को निर्धारित करते हैं। यह गुण जीव के चैतन्यस्वरूप से जुड़ते हैं और कर्मों से मुक्त/बंधित होने की संभावना को प्रभावित करते हैं।
- जीव का उपयोग/उपयोग (yoga/upayog आदि): यह संदिग्ध शब्दावली लग सकती है, पर सामान्य Jain संकल्पनाओं में “जीव का उपयोग” से तात्पर्य अक्सर जीव को कैसे किया जाता है, अर्थात जीव द्वारा किए जाने वाले कर्म-प्रेरित क्रियाकलाप या अन्य के द्वारा जीव का प्रयोजन/कार्य। यह जीव की आंतरिक गुणों से अलग एक क्रिया/कार्य के संदर्भ में होता है।
संक्षेप में: गुण जीव की अंतःस्थ और स्थायी प्रकृति हैं; उपयोग या क्रिया वे क्रियात्मक पहलू हैं जो कर्म-बंधन आदि के साथ जुड़े होते हैं। अगर आप चाहें, मैं तत्परता से तत्त्वार्थसूत्र के संबंधित श्लोक/अर्थ की सटीक व्याख्या Digambar/Shwetambar के अनुसार उद्धृत करके दे सकता हूँ।