Sabhi sharir pratighat rahit Hai Shammi Sharif
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जैन धर्म में अहिंसा परम मुख्य नियम है। “सबھی शरीऱ प्रायःहित rahit hai” जैसी बातों का तात्पर्य यह हो सकता है कि शरीरों के प्रति भी सही सम्मान और अहिंसा की दृष्टि रखनी चाहिए, क्योंकि हर जीव में जीवन (जिव) होता है।
मुख्य बिंदु:
- प्रत्येक जीव (जिव) में जीवन है और वह अहिंसा का हकदार है। किसी भी जीव को अनजाने में नुकसान पहुँचाना भी गलत माना जाता है.
- अहिंसा सिर्फ शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है; मन, वचन, कर्म—तीनों में हिंसा से बचना चाहिए। क्रोध, जिद, दुर्भावना जैसे भाव भी हिंसा के ही भाग हैं।
- जैन दर्शन में हर जीव के प्रति करुणा और सम्मान की भावना रखना आवश्यक है, चाहे वह स्थूल हो (जानवर) या सूक्ष्म (सूक्ष्मजीव).
- दो प्रमुख संप्रदाय ( Digambar और Shwetambar ) के भीतर अहिंसा और कर्म के परिचय में व्यवहारिक मत भिन्न हो सकते हैं, परन्तु अहिंसा का मूल सिद्धांत दोनों के लिए समान है: जीवन के प्रत्येक क्षण की पवित्रता बनाए रखना।
यदि आप किसी विशेष पाठ या स्तोत्र (जैसे महावीर के उपदेश, आचार्यों के श्लोक आदि) के संदर्भ में पूछना चाहें, तो स्पष्ट करें—मैं केवल जैन धर्म के प्रमाणिक स्रोतों के अनुसार उसे सरल भाषा में समझाकर अर्थ बताऊँगा।