Abhavya kabhi bhavya nhi ho skta
यह बात Jain Dharma के अनुसार कहती है कि कुछ भी अचल नहीं है; सब कुछ कर्मों और आत्मा के अवस्था पर निर्भर है। अभाव्या (जो असंभव समझा जाए) भी कर्मों के प्रभाव और तप-समाधि से भव्य (सम्पन्न/प्राप्ति) हो सकता है, यदि आत्मा शुभ कर्मों से शुद्ध होती है और भय, मोह आदि से मुक्त होती है। सरल शब्दों में: संभवता कर्मों के अनुसार ही बदलती है; abhavya से bhavya बनना कर्म-संस्कार पर निर्भर है।
अगर आप चाहें, तो इस विचार को विस्तार से Digambar और Shwetambar परंपराओं के अनुसार अलग-अलग मतलब के साथ समझा सकते हैं।