What is Panchmeru upvas?
पंचमेरु उपवास Jain धर्म में मानक या प्रमुख आचार-व्रत के तौर पर दर्ज नहीं है। आम तौर पर “उपवास/व्रत” का मतलब भोजन--अनुष्ठान से दूरी बनाकर आत्म-आनंद और शुद्धि की दिशा में रहने से है, पर पंचमेरु से जुड़ा कोई मानक व्रत-सूत्र ग्रंथों में नहीं मिलता है।
जो कुछ प्रचलित है, वह है पंचमेरु पूजा (पाँच मेरु/पाँच जिनदेह की प्रतिमा-समूह की पूजा), जो एक श्रद्धाजनक अभिषेक-आराधना का हिस्सा है और पाँच मेरुओं के आसपास के तीर्थंकरों की स्मृति-उपासना से जुड़ा होता है। इसे पूजा के रूप में समझना ठीक रहेगा, उपवास के बराबर नहीं। यदि आप पंचमेरु पूजा के बारे में अधिक जानना चाहें, तो JainKnowledge की संबंधित सामग्री देखें (पंचमेरु पूजा से जुड़ी चर्चा में मूल पाठ और अर्थ भी दिए जाते हैं)।
चोटे शब्दों में:
- पंचमेरु उपवास शब्द अपने आप में canonical Jain शब्दावली नहीं है।
- पंचमेरु पूजा एक श्रद्धास्पद पूजा है, जिसका उद्देश्य पाँच मेरु-तीर्थंकरों के समस्त जिन-प्रतिमाओं की पवित्र और भक्ति-युक्त स्तुति करना है।
यदि आप चाहें, मैं पंचमेरु पूजा के पाठ और इसका सरल अर्थ भी बता सकता हूँ।