जीव का स्वभाव
जीव का स्वभाव (जेव-धर्म के अनुसार)
- जेव (जीव) अजर-अनंत आत्मा है—जीव सदा जीवित रहता है, निराकार नहीं, बल्कि चेतनाओं से सम्पन्न होता है।
- जेव ज्ञानेन्द्रियाँ, शोषण-समझ, और आनंद (आनन्द) को अनुभव कर सकता है; पर यह सब कर्म-बंधन के कारण धूमिल हो जाते हैं।
- वास्तविक स्वभाव शुद्ध चेतना, पवित्रता और तल्लीनता है; अशुद्धि कर्म-करणों के कणों के कारण आस्तित्व-रूप से दूर हो जाती है।
- कर्म हमारे कर्म-फलों के रूप में बॉन्ड होते हैं: क्रोध, मान, माया, लोभ आदि अशुद्ध आचरण के कारण जीव बंधता है।
- मोक्ष का मार्ग है धीरे-धीरे कर्मों को हटाना और सही जीवन-मार्ग अपनाना: सही belief (श्रद्धा), सही ज्ञान (ज्ञान-प्रणाली) और सही आचरण (चारित्रिक पथ) के साथ।
- Digambar और Shwetambar दोनों ही कहते हैं कि जेव आत्मा स्वतंत्र है और कर्मों के बाँध से मुक्त होकर ही आत्म-वैभव को प्राप्त कर सकता है; भविष्य में निर्वाण-स्थिति तक जाने के लिए विविध तप, संयम और सम्यक-चेतना जरूरी है। जीवन का उद्देश्य है जड़-आनन्द-प्राप्ति से ऊपर उठकर मोक्ष-मार्ग अपनाना।
- संक्षेप में: जेव एक चेतनात्मा है जो शुद्ध और मुक्त होना चाहती है, किन्तु कर्म-बंधन इसे बाँधकर दुख-आनंद के चक्र में फंसा देता है; सही मार्ग से इस बंधन से छुटकारा मिल सकता है और आत्म-स्वरूप का प्रकाश लौट आता है।