स्वर्ग को चोखा बनाने की क्रिया
जैन धर्म में स्वर्ग (devlok) और नर्क जैसे yerlों के बारे में karmic यात्रा के अनुसार बात होती है, लेकिन स्वर्ग को “चोखा बनाने” जैसी कोई क्रिया नहीं बताई जाती। स्वर्ग प्राप्ति या वहाँ के जीवन का परिणाम जीव के किए गए कर्म, धारणा और आचार-व्यवहार पर निर्भर है, न कि किसी पृथक ritual से उसे साफ-सुथरा बनाने पर।
मुख्य बाते:
- स्वर्ग-नरक आदि ऊँचे/नीचे लोक कर्मों से बनते हैं। पुण्य-पाप के karmic बंधन रहते हैं और मोक्ष तब संभव होता है जब सभी karm-बन्धन छूट जाते हैं.
- जीवन में नैतिक आचार, सही दर्शन (सम्यक द्रष्टि), तप-साधना और अहिंसा आदि के माध्यम से आत्मा का प्रभाव कम होता है और चेतना शुद्ध होती है; यही मोक्ष की दिशा है.
- Digambar और Shwetambar दोनों ही मानते हैं कि स्वर्ग एक अस्थायी गति है और अंतिम लक्ष्य मोक्ष है; दोनों परंपराओं में कर्म और परिहार पर जोर एक ही प्रकार का रहता है, हालांकि पाठों और नामों में विवरणों की परंपरा-विशिष्ट वैरायटी मिलती है।
संक्षेप में, स्वर्ग को “चोखा बनाने” की कोई अलग पद्धति Jainism में नहीं मानी जाती; आत्मा के कर्म-बंधन कम करना और मोक्ष की ओर बढ़ना ही मूल लक्ष्य है।