Lat ki indriya
ऐसा शब्द “Lat ki indriya” Jain शास्त्रों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। संभव है कि आप “indriya” (इन्द्रियाँ) के बारे में पूछना चाह रहे हों।
Jain दर्शन में इन्द्रियाँ दो प्रकार की मानी जाती हैं:
- ज्ञानेंद्रियाँ (Jnanendriya): ये ज्ञान प्राप्त करने के स्रोत हैं—आँखें, कान, नाक, जीभ, त्वचा.
- कर्मेंद्रियाँ (Karmendriya): ये क्रिया/कर्म करने के स्रोत हैं—वाक (बातचीत), हाथ, पैर, मल-उत्सर्जन आदि क्रियाओं के अंग, और जननेंद्रिय.
कुल मिलाकर दस इन्द्रियाँ मानी जाती हैं: पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ। यदि आप किसी विशेष शब्द या संकल्पना (जैसे किसी विशेष प्रकार की “latent” इन्द्रियों) के बारे में पूछना चाहें, तो कृपया स्पष्ट करें—मैं उसी के अनुसार शुद्ध जैनार्थ संबंधित जानकारी दूँगा।