जैन धर्म में किसने प्रजा को सर्य और च्द के भय से मुक्त किया था?
मुझे स्पष्ट लगता है कि आपके प्रश्न में कुछ टाइपिंग त्रुटि हो सकती है, जैसे “सरय/च्द” कौन से शब्द हैं—इनका सही अर्थ समझना जरूरी है। Jain धर्मशास्त्रों में सीधे-सीधे ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि किसी एक व्यक्ति ने “प्रजा को भय से मुक्त किया” हो, खासकर सूर्य और चंद्र के भय से। आम तौर पर जैन शिक्षाओं में भय से मुक्ती व्यक्तिगत आध्यात्मिक अभ्यास (अहिंसा, सत्य, संयम, सही ज्ञान-श्रद्धा-चारित्र) के मार्ग से होती है, न कि मात्र राजकीय शासन से।
अगर आप किसी विशेष पाठ, स्तोत्र या कथा ( Digambar या Shwetambar पर निर्भर विभिन्न अर्थों के साथ ) के बारे में पूछना चाह रहे हैं, तो कृपया उसी पाठ के सही नाम की पुष्टि कर दें ताकि मैं उसी आधार पर सटीक अर्थ और संदर्भ दे सकूँ।