जो पांच पापों में लिन रहता है उसे क्या कहते है
जैन धर्म में पांच पाप (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील/अब्राह्म, परिग्रह) में लीन रहने वाले व्यक्ति को साधारण रूप से “पापी” कहा जाता है। वह ऐसा कर्म करता है जो आत्मा को मलिन कर देता है और नर्क आदि असुभ गति की ओर ले जाता है।
- पाँच पाप के प्रकार: हिंसा, झुठ, चोरी, कुशील, परिग्रह।
- नोट: कुछ ग्रंथों में पापों की और भी सूचियाँ मिलती हैं (जैसे 18 पाप आदि), पर मूल उल्लेख के अनुसार पाँच पाप में लीन रहने वाला व्यक्ति “पापी” ही माना जाता है।
यदि चाहें, मैं इन पाँच पापों के प्रत्येक के बारे में सरल अर्थ और Jain शिक्षा के अनुसार उनके परिणाम भी बता सकता हूँ।