प्रश्न 3 :- सम्पूर्ण धर्म का मुल क्या है ?
संपूर्ण धर्म (जैन धर्म) का मुल तत्व मुख्य रूप से तीन आधार मंत्रों में समाया है:
- अहिंसा (अहिंसा परमो धर्म): बिना हिंसा के जीवन जीना। हर जीव के प्रति करुणा और सम्मान।
- अत्तीरीय (अनुशासन/शील): सही आचरण, तप, व्रत और मन, वचन, कर्म के संयम से जीवन मोक्ष की दिशा।
- त्रिरत्न/त्रैरह तत्व: सही दर्शन (सम्यग darshan), सही ज्ञान (सम्यग ज्ञान), सही आचरण (सम्यग चरित्र) – इन्हीं تینों के संयुक्त पथ से मोक्ष प्राप्त होता है।
इसके साथ ही जैन धर्म की अन्य महत्त्वपूर्ण धारणा भी महत्त्व रखती है:
- ऐनेकांतवाद (अनेकान्तवादा) – हर वस्तु को कई दृष्टिकोण से समझना चाहिए, एक ही दृष्टिकोण से सभी को नहीं समझना चाहिए।
- सत्य, अपरिग्रह आदि नैतिक सिद्धांत भी धर्म के सार को मजबूत बनाते हैं।
संक्षेप में: स्थिर ध्येय अहिंसा और संयम के साथ सत्य, ज्ञान और आचरण की सम्यक राह ही सम्पूर्ण धर्म का मूल (मूलमंत्र) है। ध्यान रहे कि दिगम्बर और श्वेताम्बर traditions में छोटे-छोटे अभ्यास और व्याख्या में फर्क हो सकता है, पर मूल विचार वही रहता है।