आहार, शरीर, इंद्रिय, श्वासोंच्छवास भाषा, मन ये क्या है ?
संक्षेप में:
- आहार (Aahar): शरीर को संचालित और संचालित रहने के लिए जो पोषण पदार्थ प्रवेश करते हैं, वे आहार कहलाते हैं। यह पदार्थ शरीर के जीवित रहने के लिए अनिवार्य हैं।
- शरीर (Sharir): वह ठोस/भौतिक संरचना जिसमें आत्मा अनुभव, ज्ञानेन्द्रियाँ और मन क्रिया करते हैं। यह काया या शरीर है।
- इन्द्रिय (Indriya): ज्ञान-इन्द्रियाँ और कर्म-इन्द्रियाँ मिलकर पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (दृष्टि, श्रवण, गंध, स्वाद, स्पर्श) और पाँच कर्म-इन्द्रियाँ (क्रिया) को सम्मिलित करते हैं। इनसे जगत का अनुभव और कर्म-चाल चलता है।
- श्वास-उच्छ्वास (Shvas-Uchchvas) / प्राण: श्वास लेना-छोड़ना आदि जीवन-प्रणालियाँ हैं। Jain दर्शन में इसे जीवन-शक्ति या प्राण का एक परम अवयव माना जाता है; यह जीव की जीवित रहने की अवस्था को बनाए रखने में मदद करता है।
- मन (Man): विचार, चित्त, भावना आदि का केंद्र—यही आत्मा के साथ कर्मों के बंधन-छूट और सदाचार-आचरण के लिए आवश्यक मानसिक क्रिया करता है।
इन पाँचों को एक साथ रहने पर जीव में जीवन–कर्म संचालित होते हैं। इनमें से आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वास-उच्छ्वास और मन—ये सभी मिलकर मैं-आत्मा (जीव) के अनुभव, आचार-व्यवहार और कर्म-बन्धन को प्रभावित करते हैं। Digambar और Shwetambar परम्पराओं में इनके विवरण में थोड़ा भेद आ सकता है, पर मूल विचार यही रहता है: ये पाँच तत्व जीव के जीवन-संयोजन के मुख्य घटक हैं और उनके संतुलन से जीवन के नैतिक प्रदर्शन पर असर पड़ता है।
यदि आप चाहें तो मैं इन्हीं विषयों से सम्बद्ध शास्त्रों के संस्कृत/हिंदी श्लोक और उनके अर्थ भी सरल प्रकार से दे सकता हूँ।