quote in hindi or sanskrit related to uttam shauch dharma
उत्तम शौच धर्म से जुड़ा एक प्रसिद्ध श्लोक (संस्कृत) और उसका सरल अर्थ नीचे है:
श्लोकी मूल (संस्कृत) धरि हिरदै संतोष, करहु तपस्या देह सों। शौच सदा निर्दोष, धरम बढ़ो संसार में॥ उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना। आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी॥ प्राणी सदा शुचि शील जप तप, ज्ञान ध्यान प्रभावतैं।
संक्षेप अर्थ (जैन ध्वनि के अनुसार)
- पल भर में भी अगर मन में लोभ या लालच हो तो वह “शौच” नहीं मानी जाती; शुद्धता तभी है जब मन, वचन और क्रिया में संतोष और तप की धार बनी रहे।
- भीतर की शुद्धि वही उत्तम है, जो लोभ, अभिमान आदि कषायों से मुक्त हो और जिसे कर्म-शुद्धि और सम्यक् ज्ञान-ध्यान से समर्थ किया गया हो।
- बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि भी आवश्यक है; यदि भीतर मलिनता है तो बाहरी स्वच्छता केवल दिखावा है।
- निष्काम संतोष सबसे ऊँचा गुण है; लोभ से संसार में दुख ही बढ़ते हैं, संतोषी जीव सुखी रहते हैं।
नोट (द्वैत-परंपरा के संदर्भ)
- Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं में उत्तम शौच का मुख्य अर्थ आंतरिक शुद्धि और लोभ-शोक-आसक्ति जैसे कषायों का त्याग स्वीकार किया गया है; कुछ स्थानों पर बाहरी शौच को भी शास्त्रों में शुद्धि के साथ जोड़कर निभाने की वाणी मिलती है।
- इस धारण का लक्षय है आत्मा को निर्मल बनाना, ताकि श्रद्धा, समान-भावना और धर्मपूर्ण आचरण सहज बनें।
यदि आप चाहें, मैं इसी विषय से जुड़ा एक और संस्कृत श्लोक या हिन्दी अनुवाद भी दे सकता हूँ।