Example of paapanubandhi punya
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संक्षेप में: “paapanubandhi punya” ऐसा कोई मानक Jain शास्त्रिक शब्द या वर्गीकरण नहीं है। जानकारों के अनुसार, पुण्य (punya) और पाप (paap) दो अलग प्रकार के कर्म हैं, जो भाव (intent) और क्रिया के भीतर के विचार से तय होते हैं। यदि कोई क्रिया दिखने में पुण्य हो, पर उसका उद्देश्य गलत (ईर्षा, अहंकार, छल) हो तो वह पुण्य-जनक परिणामों के साथ-साथ पाप भी उत्पन्न कर सकती है; वहीं शुभ क्रिया Purely altruistic और अहिंसात्मक शैली से की गई हो तो वह पुण्य को मजबूत करती है।
नीचे सरल उदाहरण स्पष्ट करते हैं:
- पुण्य के उदाहरण (pure, निष्कपट भाव से किए गए कर्म):
- पाप के उदाहरण:
- मिश्राभाव (कभी-कभी जिसे आप “पुण्य-परंतु पाप-भाव” कहेंगे):
अगर आप चाहें, मैं इन सिद्धान्तों के आधार पर Digambar और Shwetambar परंपराओं में बताए गए स्पेसिफिक अर्थ (arth) भी संक्षेप में अलग-अलग स्पष्ट कर दूं।