प्र-9 मनुष्य गति में गर्भावस्था के समय के दुख क्या है तथा इसमें रहने का काल क्या है?
जैन धर्म के अनुसार:
- गर्भावस्था (garbha-avastha) मनुष्य गति में एक अवस्था है जिसमें आत्मा पिछले कर्मों के कारण भ्रूण के रूप में माता के गर्भ में रहती है और जन्म के पहले अनेक प्रकार के संवेदना-आनुभवित हो सकते हैं। यह अवस्था कर्मों के प्रभाव के कारण होती है और यही कारण है कि गर्भ में रहने के समय दैनंदिन असुविधाओं/दुखों का उल्लेख किया जाता है।
- इसमें रहने की अवधि: सामान्य रूप से मानव जन्म से पूर्व गर्भ में रहने की कुल अवधि नौ महीनों (9 lunar months) की मानी जाती है।
- नर-नारी और अन्य मान्यताओं के बीच व्याकरणिक/विवरणात्मक भिन्नताDigambar और Shwetambar परंपराओं में अगर हो भी, तात्पर्य वही है कि यह एक जन्म-पूर्व अवस्था है और इसका समय-सीमा नौ महीनों की मानक अवधि से संबंधित है।
- दुष्करता/दुख का मूल कारण: यह दुख सीधे शरीर के माध्यम से नहीं बल्कि कर्मों के कारण बनने वाले जीवन-स्थिति-गुणों के चयन से जुड़ा रहता है; गर्भावस्था के दौरान आत्मा अपने अतीत karmic seeds के अनुसार कुछ संवेदनाओं और परिस्थितियों का अनुभव कर सकती है। यह अवस्था फिर जन्म के समय समाप्त होकर नया जन्म लिया जाता है।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय से सम्बंधित सही शास्त्र-संवाद/सूत्र के स्वरूप (अर्थ सहित Digambar बनाम Shwetambar के भिन्न-भिन्न स्पष्टीकरण सहित) भी दूँ।