Who reply they are scholars or Google dr. Or can set like gachadhi pati and do charcha on sidhantik and sastrok ? Please give reply by stankvasi and daravasi mat separate and not only one way reply. We are all one but anekant vad naver stop.
संक्षेप में Jain धर्म में यह माना जाता है:
- क्या कोई “गु्रु-शास्त्री” या “गूगल-डॉ” लॉक-इन करते हैं? नहीं। सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान और तत्त्वों की व्याख्या परम्परा-आचार्य (आचार्य/महामना) और योग्य विद्वानों के समूह द्वारा ही निर्धारित मानी जाती है। आज के जमाने में किसी भी अज्ञात-व्यक्ति को खुद को सबसे बड़ा ज्ञानदाता मानना Jain धम्म की दृष्टि से उचित नहीं है।
- siddhānta ( सिद्धान्त ) एवं śāstra ( शास्त्र ) पर चर्चा
- यह कुरआन-तुल्य नहीं, बल्कि “anekāntavāda” के अनुसार बहुविध दृष्टिकोणों की เปิด-चर्चा है। परंपरागत रूप से सार-संदेहों को धैर्यपूर्वक, गुरु-शिष्य-parampara के अंतर्गत वाणी और प्रमाणों से समझा और सुलझाया जाता है।
- جس प्रकार Śvetāmbara परिवार में आचार्यों/उपाध्यायों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है, उसी प्रकार Digambara में भी गुरुदेवों और विद्वानों की परंपरा ज्ञान-आचरण का केंद्र रहती है।
- two main streams, simple distinctions (Stankvasi vs Daravasi)
- Stankvasi (परंपरा-सम्बद्ध विद्वान/मान्य विद्वान समूह): Śvetāmbara पक्ष के तत्त्व-समझाने वाले और उनके शिष्यों के समूह के अनुसार siddhānta-śāstra की व्याख्या, विचार-परिचर्चा और संवाद-परंपरा स्थापित रहती है। शास्त्रों की भाष्यता, मिलते-जुलते प्रमाण और दर्शन-व्याख्या में सांस्कृतिक विविधता भी स्वीकार की जाती है।
- Daravasi (Digambara पक्ष के समर्थक/गुरु-परम्परा से जुड़े विद्वान): Digambara संवाद-परंपरा में भी siddhānta-śāstra की गम्भीरता और अभ्यास-आचरण की भूमिका प्रमुख है। निम्न-स्तर तक स्वावलम्बन, भक्ति-योग और आचार-विचार के साथ अध्ययन-चर्चा होती है; परंपरा के बिना व्याख्या संभव नहीं मानी जाती।
- दोनों में एक बात समान है: eventually, तत्त्वज्ञान की शुद्धता और आत्म-उद्धार की साधना सर्वोपरि है; बहुधा अनंत-प्रश्नों पर भी एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान किया जाता है (anekāntavāda).
- lay-practitioner (gachadhi pati, etc.) और charcha
- गृहस्थ (गृहस्थ-गण) भी siddhānta-śāstra की चर्चा में भाग ले सकते हैं, पर मुख्य मार्ग-निर्देशन आचार्य/उपाध्याय से ही होता है।
- ऑनलाइन-युग में भी ज्ञान-विमर्श के लिए शुद्ध-साक्ष्यों (आगम, तत्त्वार्थ-ग्रन्थ) और सम्यक्त्व के अभ्यास को प्राथमिकता दी जाती है; पर यह ध्यान रहे कि तत्त्व-चर्चा में परम्परा-विश्वास और शास्त्रीय प्रमाण की ही मान्यता होती है, न कि किसी अज्ञात-तुरंत-समझ को।
- हम सभी एक मानी जाती बात पर विश्वास रखते हैं: Jain धर्म में अनेक दृष्टिकोण होते हैं (anekāntavāda), पर तत्त्व-चर्चा का उद्देश्य हर किसी के मोक्ष-मार्ग को स्पष्ट करना है। Stankvasi और Daravasi दोनों प्रकार की परम्पराएं इस उद्देश्य को साथ लेकर चलती हैं, और दोनों में सम्मिलित सम्मान और शील-चरित्र वही है जो गुरु-शिष्य-parampara के भीतर सुरक्षित रहता है।
यदि चाहें, मैं इस विषय पर देव-विभिन्न प्रामाणिक, Jain-शास्त्र-आधारित विवेचना के छोटे-छोटे अंश सीधे साक्ष्यों के साथ सरल भाषा में भी समझा सकता हूँ।