भगवान कितना है
Jain धर्म में भगवान की परिभाषा कुछ अलग है।
- Jainism में ब्रह्मांड का कोई संपूर्ण रचयिता (क्रिएटर) नहीं माना जाता। universe अपने आप चलता है और कर्म के अनुसार चलता है।
- देवता या देवलोक के दिव्य जीव होते हैं, वे लोग भी आत्मा हैं जो कर्म के बंधन से मुक्त नहीं होते, बल्कि अर्ध-प्राप्ति (keval-jnana) जैसी अवस्थितियाँ नहीं मानते।
- सबसे ऊँचे परिणति की अवस्था "कीवल ज्ञान" (Kevala Jnana) प्राप्त आचार्यों/तीर्थंकरों (जिन्हें मुक्त आत्मा कहा जाता है) की होती है। वे भगवान नहीं बनते, बल्कि संसार के सर्वोच्च enlightened beings होते हैं, जिन्हें भक्ति-आदर मिल सकता है।
संक्षेप में: भगवान एक एक रचयिता नहीं होते; Jainism में प्रमुख लक्ष्य आत्मा की स्व-ज्ञान/मोक्ष है। देवता केवल उच्च-स्तरीय जीव होते हैं, पर उनकी सत्ता संसार के संचालन के लिए معيار नहीं होती।
अगर आप चाहें, मैं इस विषय पर Digambar और Swetambar Tradition के मतभेद भी सरल शब्दों में समझा दूँ।