सकल तीर्थ वंदन me antriksh parshvanath
सकल तीर्थ वंदन (Sakala Tirtha Vandana) एक स्तोत्र है जिसका उद्देश्य सभी शाश्वत और अशाश्वत तीर्थों, तीर्थंकरों के चित्र-प्रणाम, और शीर्ष देव-सेनों को नमन करना है। इस स्तोत्र के अनुसार समस्त तीर्थ-स्थलों और जिन-प्रतिमाओं के प्रति आदर जताया जाता है, वे तीन लोको में निरंतर श्रद्धापूर्वक वंदनी होती हैं। नीचे इसके मूल अंश का संक्षिप्त पाठ और अर्थ दिया गया है:
मूल पाठ का आरम्भ (संस्कृत/हिंदी मिश्रण में): सकल तीर्थ वंदूं कर जोड, जिनवर नामे मंगल क्रोड पहेले स्वर्गे लाख बत्रीश, जिनवर चैत्य नमुं निश-दिश ...
अर्थ ( arth ):
- सभी तीर्थ-स्थानों, सभी तीर्थंकरों के नाम पर मंगल कर (आशीर्वाद देते हैं)।
- स्वर्ग-स्तर के प्रमुख तीर्थ-स्थान और चैत्य-स्थलों को नमस्कार किया गया है, साथ ही अन्य लोकों के महान आचार-गुण-सम्पन्न तीर्थ-जीवों की उपासना भी शामिल मानी जाती है।
- यह स्तोत्र श्रद्धालुओं को समस्त तीर्थ-स्थलों की समग्र वंदना के लिए प्रेरित करता है, न कि केवल किसी एक तीर्थ के लिए।
अंतर-मत ( Digambar vs. Shwetambar ):
- सकल तीर्थ वन्दना एक सामान्य Jain स्तोत्र है जिसे मुख्यतः श्वेतांबर परंपरा में अधिक संदर्भित रूप में पाया जाता है, परन्तु विदेशी स्थानों के कुछ Digambar उपासक भी इसी प्रकार की बहु-तीर्थ-चरण-नमन की साधना करते हैं। क्रमबद्ध विवरण या तीर्थ-गणना में मतान्तर संभव हो सकता है, पर मूल उद्देश्य सभी तीर्थों का सम्मान और प्रणाम है।
आपके सवाल में “अंतरिक्ष पार्श्वनाथ” (Antarikṣa Parshwanath) का संदर्भ है। Sakala Tirtha Vandana के उद्घोष-चर्या में समष्टि तीर्थों और तीर्थंकरों की वंदना है; इस स्तोत्र में Antarikṣa Parshwanath के लिए विशेष एकल-स्तोत्र की तरह उल्लेख कई इतिहासिक ग्रंथों में मिलता है, पर Sakala Tirtha Vandana के मुख्य अंश में Antarikṣa Parshwanath का नाम-उल्लेख सीधे रूप में एक अलग पंक्ति के रूप में स्पष्ट नहीं दिखता है। Antarikṣa Parshwanath मंदिर और उससे संबंधित साहित्य (जैसे Antarikṣa Parshwanath Stotra आदि) अलग से पढे जाते हैं।
आप चाहें तो Sakala Tirtha Vandana की पूरी पाठ-सूची और अर्थ निकालकर देख सकते हैं: