1657 me kisnesatrunjay ka sangh nikala
1657 ईस्वी में, श्री शत्रुंजय तीर्थ (पलिताणा, गुजरात) के लिए एक प्रमुख संघ (तीर्थयात्रा समूह) का आयोजन हुआ था। जैन परंपरा में 'संग' या 'संघ' निकालनाः तीर्थ यात्रा के लिए सामूहिक रूप से जाना एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है।
इतिहास के अनुसार, 1657 ईस्वी में श्री जिनकुशलसूरिजी के नेतृत्व में एक भव्य शत्रुंजय संघ निकला था। इस संघ में अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया और शत्रुंजय तीर्थ की वंदना की। इस संघ का उल्लेख जैन इतिहास में प्रमुख घटनाओं के रूप में किया जाता है।
यह संघ जैन धर्म में तीर्थ यात्रा, एकता और भक्ति भावना का प्रतीक माना जाता है। शत्रुंजय पर्वत को जैन धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है, और वहां संघ के रूप में जाना विशेष पुण्यदायक समझा जाता है।