Karn tirthankarnaam karm ka band kab karenge ya kab kiye
संक्षेप में बताऊँ:
- “कर्ण” नाम के कोई तिर्थंकर जैन धर्म में नहीं हैं। 24 तिर्थंकरों के नाम और क्रम में-karna तिर्थंकर कभी नहीं आता। प्रमुख तिर्थंकरों में आदिनाथ (ऋषभनाथ) से शुरू होकर महावीर स्वामी तक सूची है।
- karm ka bandhan (कर्मों का बंधन) तब होता है जब अवगुणपूर्ण कर्म हमारे ऊपर आ जाते हैं (आस्रव होता है) और वह हमारे कर्म-संवरण से बढ़ते रहते हैं। इसे रोकने और घटाने के लिए Jain मार्ग में कहा गया है: सम्वर (कर्म के इनफ्लो को रोकना) through सही श्रद्धा, सही ज्ञान, सही आचरण — और फिर विरक्ति/त्याग, तप, उपवास आदि के पवित्र कर्मों से जन्मों के कर्मों को धीरे-धीरे समाप्त करना।
- मोक्ष तब होता है जब सभी घatiya (कमीने) कर्म समाप्त हो जाते हैं और ज्ञान प्रकाश में आकर कीवल्य प्राप्त होता है; अर्थात् मोक्ष तक पहुँचने के लिए कर्मों का अंत-परिणाम सीखना और साधना करना जरूरी रहता है। किसी एक तिर्थंकर के नाम से कर्म साफ नहीं होते; कर्मबंध सामान्य प्रथाओं से धीरे-धीरे घटते-खत्म होते हैं और अंततः मोक्ष तक पहुँच सकते हैं।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय पर Digambar और Shwetambar tradiशन के भीतर होने वाले कुछ प्रमुख अंतर भी सरल शब्दों में समझा दूँ।