स्थितिकरण अंग शरीर के किस अंग के समान है
स्थितिकरण अंग का अर्थ शरीर के किसी अंग से नहीं है। यह जैन धर्म के छह अंगों में से छठा अंग है, जो दूसरों को धर्म के मार्ग में स्थिर कर देने की क्रिया को कहता है।
मुख्य अर्थ (Arth):
- सम्यग्दर्शन या सम्यकचारित्र से विचलित जीवों को फिर से धर्म में स्थिर कर देना ही स्थितिकरण है।
- यह व्यवहारिक गुण है: ज्ञान-चारित्र से डिगे हुए जीवों को उनके मार्ग पर पुनः स्थापित करना।
- इसे विद्वान लोग बताते हैं कि जिस तरह डिगे हुए जीवों को फिर उसी स्थिती में लाकर धर्म के अनुसार चलाना उचित है, वही स्थितिकरण है.
संस्करण-परिधान:
- स्थितिकरण अंग को Digambar और Shwetambar दोनों परम्पराओं में समान रूप से माना गया है; परन्तु हर स्थिति में इसका केंद्र बिंदु है—धर्म में दृढ़ता और फिर से आत्म-सम्मुख कर देना।
संक्षेप में: स्थिर करना मतलब जो डिग गया हो उसे धर्म के मार्ग पर वापस लगाना; यह शरीर के अंग नहीं, बल्कि एक आचरण-गुण है।