जैसे जैन आयुर्वेदिक ग्रंथ कल्याणकारक की रचना आचार्य उग्रादित्य ने की थी। उसी तरह अन्य आचार्यों जैसे पुण्याचार्य, वाघदेव, सिद्दसैन, मट्टाद, सिंहनाद ने किन वैद्यक ग्रंथों की रचना की? Digambar shastra
संक्षेप में, Digambar Jain शास्त्रों में वैद्यक (आयुर्वेद) से जुड़े जो प्रमुख ग्रंथक सूरते हैं, वे कुछ प्रमुख आचार्यों के नाम से जुड़े मिलते हैं, लेकिन आपके बताए कुछ नामों के लिए स्पष्ट, sola surviving Digambar स्रोतों में समान रूप से ठोस रचना-प्रमाण नहीं मिलते। फिर भी पारम्परिक Jain विद्या-परम्परा में निम्न महत्वपूर्ण उत्तराधिकृत उदाहरण मिलते हैं:
- समन्तभद्र (Samanthabhadra) — उनके रचित कार्यों में अस्थायी रूप से अजमेरित “अष्टाङ्ग आयुर्वेद” या সম्रग्रह जैसी धारणाएं उद्धृत मिलती हैं;.Pushpa Ayurveda आदि Jain आयुर्वेद पाठों के संदर्भ भी मिलते हैं। यह ग्रंथ Digambar परम्परा में स्वास्थ्य-विज्ञान के क्षेत्र में पुरानी धारणाओं का स्रोत माना जाता है. (आयुर्वेद-सम्बन्धी Jain योगदान का सार) ( easyayurveda.com, encyclopediaofjainism.com)
- उग्रदित्याचार्य (Ugraditya) — उन्हें कल्याणकारिका (Kalyanakarika) जैसे ग्रंथों के लेखक/विद्वान के रूप में जाना जाता है; साथ ही वे वैद्य-सर सार-संग्रह (Vaidya Sara Sangraha) आदि का उल्लेख करते हैं। इन ग्रंथों में आचार-विधि, आयुर्वेद-निर्देशन और दवाओं के वर्गीकरण का समावेश है. Digambar आयुर्वेद परम्परा में इन्हीं ग्रंथों को प्रमुख माना जाता है. ( easyayurveda.com)
- पूज्यपद (Pujyapada) — Vaidya Shastra, Vyakarana Shastra जैसे विषयों के उल्लेख मिलते हैं; नाड़ी-शास्त्र, दवा-संस्कार आदि के संदर्भ bas-आयुर्वेद ग्रंथों में उनके नाम आते हैं। Digambar संदर्भों में Pujyapada के चिकित्सा-ग्रंथों के उल्लेख मिलते हैं. ( easyayurveda.com)
बहरहाल, कुछ नाम जैसे पुण्याचार्य, वाघदेव, स Siddha-sain (सिद्धसैन), मट्टाद, सिंहनाद—इनके संदर्भ Digambar आयुर्वेदिक साहित्य में स्पष्ट, एक-एक ग्रंथ के रूप में ठोस रूप से दखल नहीं बनाते। कई बार इन नामों का उल्लेख आधुनिक समालोचनाओं या समकालीन शोध-आलों में आता है, पर surviving Digambar ग्रंथों में इनका एक ठोस, स्वयंसिद्ध ग्रंथ-रचना-प्रमाण दूर-दूर तक नहीं मिल पाता। इसलिए, इन नामों के लिए “क्या-क्या ग्रंथ” का स्पष्ट उत्तर स्थिर नहीं माना जाता।
जैनज्ञान सेंटर के अनुसार Jain आयुर्वेद के क्षेत्र में प्रमुख व्यवस्थित रचना और उनके संपूर्ण विवरणों के बारे में नीचे के पन्ने पढ़े जा सकते हैं (जहाँ Digambar-प्रयोग और ऐतिहासिक संदर्भ भी स्पष्ट होते हैं):
- आयुर्वेदिक योगदान और आचार्यों की सूची: यह लेख Jain आयुर्वेद-इतिहास के प्रमुख बिंदु देता है। You can read more here
- कल्याणकारिका (Kalyanakarika) आदि के बारे में संक्षिप्त परिचय: You can read more here
नोट
- Digambar बनाम Śvetāmbara में वैद्यक ग्रंथों के महत्त्व और canonical-स्थिति अलग-अलग मानी जाती है; उदाहरणतः Kalpa-sutra Digambar-सम्प्रदाय में canonical नहीं है, जबकि Śvetāmbara परम्परा में तुलनात्मक रूप से केंद्रीय है. ऐसा धार्मिक-सांस्कृतिक फर्क ग्रंथ-स्तर पर भी अलग-थलग दिखता है। यही परिभाषा इस प्रश्न के उत्तर में भी परिलक्षित है कि कौन-सा ग्रंथ किस परम्परा में माना गया है और कौन-सा नहीं।
अगर आप चाहें, मैं इन नामों के बारे में Digambar परम्परा के प्राथमिक स्रोतों से और अधिक स्पष्ट, शाब्दिक arth के साथ व्यवहारिक सार दे सकता हूँ—बस बताइए कि किस आचार्य-ग्रंथ के बारे में आपको विस्तार चाहिए।