जैन धर्म के अनुसार, के साँस लेने से शिला हिलती थी
जैन धर्म में शास्त्रीयTeachings के अनुसार सांस लेने या प्राण के स्पर्श से शिलाओं या पत्थरों के हिलने जैसी कोई प्रमुख शिक्षा नहीं मिलती। pụrụhrases में कुछ कथाओं में महावीर या अन्य तीर्थंकरों की दिव्य शक्तियों के चमत्कार बताए जाते हैं, पर उन्हें सांस से शिला हिलना कह कर सामान्य रूप से नहीं जोड़ा जाता। ऐसी घटनाएँ विशेष साहित्यों में मिलती हैं, लेकिन वे मुख्य धर्मगुरु (तीर्थंकर) के आध्यात्मिक प्रभाव या चमत्कार के रूप में बताई जाती हैं, सांस के साधारण प्रभाव के रूप में नहीं।
अगर आप किसी खास ग्रंथ या कथा का संदर्भ दे सकें (उदा.Digambar/Shwetambar संस्करण, या किसी विशिष्ट संहिता/कथा का नाम), तो मैं उसी के अनुसार सही अर्थ और स्रोत स्पष्ट कर दूँगा।