nav ang puja shlok
Nav Ang Puja (Nav-anga Puja) श्लोकों की एक साधना है जिसमें जैन मूरत (तीर्थंकर) के नौ अंगों की चरण-वंदना की जाती है। नीचे स्वेतांबर Tradition के सामान्य क्रम के अनुसार नौ अंगों के लिए छोटे श्लोक दिए जा रहे हैं। ध्यान दें कि Digambar और Śvetāmbara परंपराओं में पाठ-क्रम और शब्दावलियाँ कभी-कभी भिन्न हो जाती हैं; ऊपर दिए श्लोक एक व्यापक, सरल संस्करण है जिसे कई साधारण पूजाओं में जोड़ा जाता है।
1) दाहिने पाँव के पैर और बाईं ओर के पैर
- नमो Arihantanam
2) दाहिने घुटने और बाएँ घुटने
- नमो Siddhanam
3) दाहिने भुजा के केन्द्र और बाएँ भुजा के केन्द्र
- नमो Ayariyanam
4) दाहिने कंधे और बाएँ कंधे
- नमो Uvajjhayanam
5) सिर के शीर्ष (शीर्षस्थ)
- नमो Loy Savvasahunam
6) भृकुटी (आँख-केन्द्र) के बीच
- Eso Pancha Namukkaro
7) गला (कंठ) के केन्द्र
- Savvapavappanasano
8) छाती के केन्द्र
- Manglā Namcha Savvesim
9) नाभि (नाभी) केन्द्र
- Padhamam Havai Mangalam
संक्षिप्त अर्थ (arth) — प्रत्येक अंग के पूजन का उद्देश्य:
- पहले अंग (पैर): संत-जनों के पांव की भांति नम्रता और दौड़-धूप से भी सही राह पकड़ने की इच्छा.
- दूसरे अंग (घुटने): कठोर तप और स्थिर समाधि की लालसा.
- तीसरे अंग (भुजाएं): ज्ञान और आचार्य-गुणों के पालन की प्रेरणा.
- चौथे अंग (कंधे): वीर्य-विश्वास और कर्म-निरोध की साधना.
- पाँचवाँ अंग (सिर): समस्त शुभ-आशाओं और मोक्ष के पथ पर ऊँचाई।
- छठा अंग (भौह/माथा): पंच-नाम-कारो का उच्चारण; चारों ओर पवित्रता की.vertex
- सातवाँ अंग (गला): सर्व पापों के विनाश के लिए जप-वाणी।
- आठवाँ अंग (छाती): मंगल-नाम और सभी शुभ कर्मों की आस्था।
- नौवाँ अंग (नाभि): मंगल-मेavicon और मोक्ष की दिशा में शुभ संकेत।
ध्यान दें:
- आपके क्षेत्र/गुरु-सम्प्रदाय के अनुसार पाठ और शब्द कुछ-कुछ भिन्न हो सकते हैं। यदि आप किसी विशेष दिगंबर/श्वेतांबर परंपरा के लिए सटीक श्लोक चाहते हैं, बताइए, मैं उसी पर आधारित पाठ दे दूँगा।
- अगर आप चाहें, मैं जानता-जानता मूल पाठ (संस्कृत/प्राकृत) के साथ उसी के अर्थ भी दे दूँगा।
मीट-नोट: Nav Ang Puja के बारे में अधिक संपूर्ण जानकारी के लिए आप नीचे के JainKnowledge पन्ने से संदर्भ देख सकते हैं: