जैन धर्म अनुसार अपरिग्रह से क्या तात्पर्य है । इसकी विस्तृत व्याख्या किस आगम में है
अपरिग्रह Jain Dharma में “अपरिग्रहण” का तात्पर्य है:
- गैर- possessiveness: वस्तुओं के प्रति आवश्यक से अधिक लगाव न रखना।
- सरल जीवन: केवल आवश्यकता के अनुसार ही सामग्रियाँ रखना; हवाला-परिश्रम, अति-संग्रह और दिखावा से बचना।
- सांसारिक संपत्ति पर नियंत्रण: धन-सम्पत्ति को अपने कुटुम्ब और समाज के हित में सही तरीके से उपयोग करना, और अति-त्याग का पथ अपनाना।
पद्य/आगम के हिसाब से विस्तृत व्याख्या:
- महाव्रतों में अपरिग्रह का खास महत्व है: गृहस्थ भी सीमित आवश्यकताओं के साथ जीवन जीने और धन को अधिकारपूर्वक उपयोग करने की सीख पाते हैं; संन्यासियों के लिए तो यह प्रमुख महाव्रतों में से एक बन जाता है।
- Digambar बनाम Śvetāmbara में अलग विवरण कैसे है: Digambar परंपरा में महाव्रत (सम्पूर्ण त्याग-आदि) के ढांचे में अपरिग्रह को कठोर रूप में रखा गया है; Śvetāmbara परंपरा में भी यही सिद्धांत है, पर व्यवहारिक अभ्यास और स्पष्टीकरण सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है।
संक्षिप्त सार:
- आपूर्ति-विकल्प के बीच संतुलन बनाए रखना; आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संचय से दूरी रखना; और धन का उपयोग समाज-कल्याण के लिए करना—ये सभी अपरिग्रह के मूल तत्व हैं।
हिन्दी में सरल सार के साथ पढ़ने के लिए आप नीचे JainKnowledge के संबंधित पन्ने देख सकते हैं:
- Aparigraha और उसका पर्यावरणीय/आचार-आध्याय में संदर्भ: एक आधुनिक व्याख्या जो परंपरा को आधुनिक संदर्भ से जोड़ती है
- Jain Āgamas के सिद्धांत (व्यवसाय, संपत्ति, नैतिकता आदि) के भीतर Aparigraha की भूमिका:
- Ajiva/धर्म-आचार में Aparigraha का संकल्प, गृहस्थ-जीवन में व्यवहारिक मार्गदर्शन:
नोट:
- अगर आप चाहें, तो मैं Aparigraha के मूल सूत्रों (आगम-सूत्र) के शब्दों के साथ सरल अर्थ भी दे सकता हूँ, लेकिन यहाँ संक्षेप में सार-संकेत दिया गया है।