details of lokaguch panth
“लोकगुच्छ पंथ” से आपका आशय लगभग निश्चित रूप से “लोकगच्छ / लोंकागच्छ” से है, जो आगे चलकर स्थानकवासी परम्परा का मूल आधार बना। संक्षेप में विवरण:
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1. लोकगच्छ / लोंकागच्छ क्या है?
- यह श्वेताम्बर जैनों के भीतर बना एक सुधारवादी पंथ था।
- इसके प्रवर्तक माने जाते हैं –
- लोकाशाह ने यह बात रखी कि:
इसी विचारधारा से जो संघ बना, उसे आगे चलकर लोकगच्छ (Lokagaccha / Lonka-gaccha) कहा गया।
आप लोंकाशाह के बारे में संक्षिप्त जानकारी यहाँ भी देख सकते हैं:
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2. लोकगच्छ की मुख्य विशेषताएँ
- प्रतिमा–पूजा का विरोध (अन्यपुजक / अन्तर्पुजक परम्परा)
- मन्दिरों, प्रतिमाओं और शोभा–जुलूस आदि से दूरी रखने पर बल। - धर्म का केन्द्र–बिन्दु: भीतर का तप, स्वाध्याय और सम्यक् आचार।
- आगम–आधारित धर्म
- लोंकाशाह ने उपलब्ध प्राचीन आगमों का अध्ययन कर, उन्हीं को मानक माना। - बाद के लेखकों के मतानुसार, लोकगच्छ परम्परा में लगभग ३२ आगमों को विशेष मान्यता दी गई (कुछ ग्रन्थों में संख्या आदि में मतभेद भी मिलते हैं, पर मूल भावना “आगम–प्रधान धर्म” ही थी)।
- यति–परम्परा और बाह्य आडम्बर का विरोध
- उस समय के कुछ चैत्यवासी / यति साधुओं में धन, शक्ति, मन्त्र–तन्त्र, आराम–प्रेम आदि की प्रवृत्तियों के विरुद्ध आवाज़ उठी। - लोकगच्छ ने कहा कि साधु–जीवन कठोर संयम, अप्रमाद, भिक्षाटन और नियम–पालन से होना चाहिए, न कि विलासिता से।
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3. आगे की कड़ियाँ – धुँधिया पंथ, स्थानकवासी और तेेरापंथ
लोकगच्छ से ही आगे चलकर यह क्रम बना:
- लोकगच्छ → धुँधिया पंथ (धुंधिया / धूंधिया)
- बाद में लाबाजी / लवाजी आदि आचार्यों ने लोकगच्छ की परम्परा में और सुधार किए। - मन्दिर–पूजा के बजाय स्थानक / उपास्रय में साधना पर ज़ोर, इस कारण इन्हें धुँधिया पंथ कहा गया (कुछ क्षेत्रों में “ढुँढिया” नाम से प्रसिद्ध)।
- धुँधिया पंथ → स्थानकवासी सम्प्रदाय
- लोकगच्छ के इन्हीं सुधारों और धुँधिया पंथ की परम्परा से एक सुसंगठित स्थानकवासी श्वेताम्बर सम्प्रदाय विकसित हुआ। - इनकी मुख्य पहचान: - प्रतिमा–पूजा नहीं, - स्थानक / उपास्रय में समायिक, प्रतिक्रमण, प्रवचन और ध्यान।
- स्थानकवासी → तेेरापंथ
- स्थानकवासी परम्परा से ही आगे चलकर आचार्य भीखणजी महाराज द्वारा श्वेताम्बर तेेरापंथ की स्थापना हुई, जो आज भी बहुत अनुशासित मानी जाने वाली परम्परा है।
इस प्रकार, लोकगच्छ / लोकगुच्छ पंथ को आप समझ सकते हैं:
> “श्वेताम्बर जैन समाज के भीतर जन्मा एक आगम–प्रधान, अहिंसा–संयम–केन्द्रित, प्रतिमाविरोधी सुधार आंदोलन, > जिससे आगे चलकर धुँधिया पंथ, स्थानकवासी और तेेरापंथ जैसी परम्पराएँ निकलीं।”
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4. दिगम्बर–श्वेताम्बर भेद के सन्दर्भ में
- लोकगच्छ / लोकगुच्छ / लोंकागच्छ पूरा इतिहास श्वेताम्बर परम्परा के भीतर का है।
- दिगम्बर परम्परा में कई अपने सुधार–आन्दोलन (जैसे तरणपंथ, बानारसीदासजी की धारा आदि) अलग से हैं,
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यदि आपके “लोकगुच्छ पंथ” से कोई और विशेष स्थानीय शाखा का अर्थ था (जैसे किसी गाँव या गच्छ–विशेष का लोकल नाम), तो वह भी प्रायः इसी लोंकागच्छ / स्थानकवासी–परम्परा से जुड़ी शाखा मानी जाएगी।