Jain upkaran speech
नीचे “जैन उपकरण” विषय पर एक सरल और छोटी speech दे रहा हूँ, जिसे आप स्कूल या सभा में बोल सकते हैं। आप चाहें तो इसे और छोटा या बड़ा भी कर सकते हैं।
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जैन उपकरण – सरल भाषण
आदरणीय गुरुदेव / शिक्षकगण और मेरे प्यारे साथियों, आज मैं “जैन उपकरण” के बारे में कुछ बातें बताना चाहता/चाहती हूँ।
“उपकरण” का मतलब है – ऐसे साधन या चीज़ें, जो हमें धर्म और संयम के मार्ग पर चलने में मदद करती हैं। जैन धर्म में दो प्रकार के प्रमुख उपकरण दिखाई देते हैं:
1. साधु के उपकरण
जैन साधु–साध्वी बहुत कम और बहुत ही विशेष चीज़ें रखते हैं। उनका उद्देश्य केवल अहिंसा और अपरिग्रह को पालन करना होता है।श्वेतांबर परंपरा में साधु के मुख्य उपकरण हैं:
- मुँहपट्टी (मुफ़्पत्ती) – ताकि बोलते समय छोटे जीवों को कम से कम हानि पहुँचे।
- रजोहरण / ओघो – नरम झाड़न, जिससे बैठने की जगह साफ़ की जाती है, ताकि जमीन पर रहने वाले छोटे जीव हट जाएँ और उन पर पैर न पड़े।
- कमंडल – शुद्ध पानी रखने का पात्र।
- पात्र – जिसमें वे गोचरी (भोजन) ग्रहण करते हैं।
दिगंबर परंपरा में मुख्य उपकरण हैं:
- पिच्छी – मोर के गिरे हुए पंखों से बना झाड़न, जिससे वे जीवों को हटाते हैं।
- कमंडल – शुद्ध जल के लिए।
2. पूजा के उपकरण (पूजा थाली, अष्ट-द्रव्य)
मंदिर या घर में हम जो पूजा करते हैं, उसमें भी कुछ उपकरण होते हैं, जैसे: जल, चंदन, फूल, दीपक, धूप, अक्षत (चावल), नैवेद्य और फल आदि। इन सबको अष्ट-द्रव्य कहा जाता है। इनका भाव यह है कि –- हम अपने मन, वचन और काय को शुद्ध करें,
- तीरथंकरों के गुणों का स्मरण करें,
- और वैसा आदर्श जीवन जीने का संकल्प लें।
जैन धर्म का मुख्य संदेश है – अहिंसा, संयम और अपरिग्रह। साधु के उपकरण हों या पूजा के उपकरण – इन सबका सच्चा मूल्य तभी है, जब हम इनके अंदर की भावना समझकर अपना जीवन बदलें।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा/चाहूँगी कि: जैन उपकरण हमें सिखाते हैं कि कम साधनों में, कम हिंसा के साथ, अधिक से अधिक शुद्ध, सरल और जाग्रत जीवन जीया जा सकता है।
जय जिनेन्द्र।
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अगर आप चाहें तो इसी भाषण का छोटा 1–2 मिनट वाला version भी बना सकते हैं, बस प्रत्येक बिंदु को एक–एक पंक्ति में बोलें। जैन उपकरण और पूजा-द्रव्यों पर और सरल जानकारी के लिए आप यहाँ पढ़ सकते हैं और साधु के उपकरण के लिए यहाँ