क्षायिक सम्यक दृष्टि कैसे प्राप्त करें ?
क्षायिक सम्यक दृष्टि (क्षायिक सम्यग्दर्शन) बहुत ऊँची आध्यात्मिक अवस्था है। इसे पाने का सीधा‑सा “टिप्स वाला” तरीका नहीं है; यह अनेक जन्मों की साधना, पुण्य और तप का फल है। फिर भी, उसके लिए आवश्यक मुख्य साधन सरल भाषा में इस प्रकार समझ सकते हैं:
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1. पहले सामान्य सम्यक दृष्टि की प्राप्ति
क्षायिक सम्यक दृष्टि तो बाद की अवस्था है। सबसे पहले तो सम्यक दर्शन जागता है – यानी तत्त्वों (जीव, अजीव, पुण्य‑पाप, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष) में निष्कलंक श्रद्धा।
इसकी शुरुआत होती है:
- मिथ्यात्व (ग़लत मान्यता) का त्याग
- जिनेन्द्र, गुरु, धर्म, तत्त्वों में दृढ़ विश्वास
- “मैं शुद्ध आत्मा हूँ, शरीर‑इन्द्रिय‑मन से भिन्न हूँ” – ऐसी जागरूकता
इसके लिए:
- बार‑बार जिनवाणी सुनना (श्रवण)
- उस पर विचार (मनन)
- और शांत भाव से उसका चिंतन‑ध्यान (निधिध्यासन) बहुत ज़रूरी है।
सम्यक दर्शन की सरल व्याख्या आप यहाँ पढ़ सकते हैं: सम्यक दर्शन क्या है
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2. क्षायिक सम्यक दृष्टि क्या है?
सम्यक दृष्टि के भी कई भेद माने गए हैं – जैसे औपशमिक, क्षायोपशमिक, और क्षायिक।
- औपशमिक – मोहनिय कर्म दब जाते हैं, नष्ट नहीं होते; इसलिए सम्यक दर्शन अस्थायी होता है।
- क्षायोपशमिक – कुछ कर्म नष्ट, कुछ दबे रहते हैं।
- क्षायिक सम्यक दृष्टि – जब दर्शन‑मोहनिय कर्म का पूरा क्षय (खत्म) हो जाता है,
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3. क्षायिक सम्यक दृष्टि के लिए आवश्यक आंतरिक तैयारी
यद्यपि प्रत्यक्ष “मैं अभी क्षायिक सम्यक दृष्टि ले लूँ” ऐसा हमारे बस में नहीं, लेकिन उसके लिए अनुकूल कारण हम बना सकते हैं:
(क) मिथ्यात्व के कारणों से बचना
जैन सिद्धांत में मिथ्यात्व के पाँच प्रकार बताये हैं – एकान्त, विपरीत, संशय, अगृह, विकल्प आदि। इनसे बचने का अर्थ है –- हठी एकतरफ़ा मत से बचना
- सही‑गलत को उल्टा न मानना
- आत्मा, कर्म, मोक्ष आदि में संदेह न पालना
- तत्त्वज्ञान के प्रति उदासीन न रहना
- निरर्थक कल्पना‑विचारों में न उलझना
इससे दर्शन‑मोहनिय कर्म की कषाय कम होती है।
(ख) जिनवाणी के प्रति गहरी श्रद्धा
- तत्त्वार्थ सूत्र, आगम, आचार्यों के ग्रंथ – इनका नियमित श्रवण‑अध्ययन
- किसी एक परम्परा के सम्यक‑दृष्टि आचार्य की शरण लेकर शास्त्र सीखना
- शंका हो तो विनयपूर्वक समाधान करना, अपने से अनुमान लगाकर मत न गढ़ना
(ग) राग‑द्वेष को घटाना
क्षायिक सम्यक दृष्टि में राग‑द्वेष अत्यन्त सूक्ष्म हो जाते हैं। हमारे स्तर पर कर सकते हैं:- जितना बने, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का पालन
- क्रोध आये तो “मैं शुद्ध आत्मा हूँ, यह क्षणिक कषाय है” – ऐसा स्मरण
- मान, माया, लोभ को पाप समझकर उनसे दूरी
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4. तप, संयम और स्वाध्याय
दर्शन‑मोहनिय कर्म के क्षय के प्रमुख साधन:
- तप (आन्तरिक‑बाह्य)
- स्वाध्याय
- ध्यान
ये सब मिलकर मोहनिय कर्म को जला‑जला कर कम करते हैं।
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5. शुद्ध भाव – सबसे मुख्य
अंत में, कर्म तो भाव से ही बँधते‑कटते हैं। क्षायिक सम्यक दृष्टि के लिए:
- पूजा, पाठ, दान, तप – सब प्रसिद्धि, दिखावे, भय, लोभ से नहीं,
- किसी भी साधना के समय भीतर से भाव हो –
ऐसे शुद्ध भाव बार‑बार होंगे तो आगे के जन्मों में दर्शन‑मोहनिय का क्षय होकर क्षायिक सम्यक दृष्टि की अवस्था अवश्य आयेगी।
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सार
- पहले सामान्य सम्यक दर्शन – तत्त्वों में निष्कलंक श्रद्धा – प्राप्त हो।
- मिथ्यात्व, शंका, हठी मत, राग‑द्वेष धीरे‑धीरे कम हों।
- जिनवाणी‑श्रवण, स्वाध्याय, तप, संयम और ध्यान से मोहनिय कर्म क्षीण हों।
- जन्म‑जन्मांतर की ऐसी साधना के पूर्ण होने पर,
जब दर्शन‑मोहनिय कर्म का पूर्ण क्षय होता है, तभी क्षायिक सम्यक दृष्टि प्राप्त होती है – जो कभी नष्ट नहीं होती।
यही पारम्परिक जैन दृष्टि से इसका सरल मार्ग‑विवरण है।