Krishna leshiya ke bare me story's
मैं पहले बहुत सरल भाषा में “कृष्ण लेश्या” समझाता हूँ, फिर उससे जुड़ी प्रसिद्ध कहानियाँ बताता हूँ।
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1. कृष्ण लेश्या क्या है?
जैन धर्म में “लेश्या” का मतलब है – आत्मा का रंग / मन की दशा। हमारे विचार, भाव, और कर्म के अनुसार आत्मा पर एक तरह का रंग चढ़ जाता है।
6 प्रकार की लेश्या मानी गई हैं:
- कृष्ण (काली) – सबसे खराब
- नील (नीली)
- कपोत (स्लेटी / धूसर)
- तेजो (लाल)
- पद्म (पीली)
- शुक्ल (सफेद) – सबसे श्रेष्ठ
कृष्ण लेश्या (काली लेश्या) की विशेषताएँ:
- बहुत क्रूर, दयाहीन स्वभाव
- किसी पर दया नहीं, बदला लेने की भावना
- हमेशा जलन, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा
- हिंसा करने में संकोच नहीं
- धर्म में रुचि नहीं
- ऐसा मन “सबसे खतरनाक” माना गया है
- जो व्यक्ति मरते समय कृष्ण लेश्या में होता है, उसका अगला जन्म नरक में होता है
श्वेतांबर और दिगंबर – दोनों परम्पराएँ लेश्या का सिद्धांत और कृष्ण लेश्या का अर्थ लगभग समान ही बताती हैं।
आप लेश्या के बारे में और विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं
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2. जामुन के पेड़ की प्रसिद्ध कहानी (कृष्ण लेश्या वाला व्यक्ति)
छः यात्री कहीं जा रहे थे। उन्हें बहुत भूख लगी। रास्ते में एक जामुन का बड़ा पेड़ दिखा, जिस पर बहुत सारे पके हुए फल लगे थे।
सबने कहा – “यहाँ से फल खाकर भूख मिटाते हैं।” लेकिन कैसे – इस पर सबके अलग-अलग विचार आए:
- पहला व्यक्ति (कृष्ण लेश्या)
- बोला: “पूरा पेड़ ही जड़ से काट दो। पेड़ गिर जाएगा, आराम से सारे फल ले लेंगे।” - सोचिए, उसे सिर्फ अपने पेट की पड़ी है, पेड़ की ज़रा भी दया नहीं। - यह कृष्ण लेश्या की सोच है – दूसरों का नाश करके अपना फायदा।
- दूसरा व्यक्ति (नील लेश्या)
- बोला: “पूरा पेड़ क्यों काटना? सिर्फ मोटी-मोटी डाल ही काट देते हैं।”
- तीसरा व्यक्ति (कपोत लेश्या)
- बोला: “मोटी नहीं, पतली डालें ही काट लेते हैं।”
- चौथा व्यक्ति (तेजो लेश्या)
- बोला: “न डालें काटनी हैं, न पेड़। बस टहनियों पर चढ़कर फल तोड़ लेते हैं।”
- पाँचवाँ व्यक्ति (पद्म लेश्या)
- बोला: “जो फल पक कर नीचे गिर गए हैं, वही उठा लेते हैं, पेड़ को बिलकुल नुकसान नहीं।”
- छठा व्यक्ति (शुक्ल लेश्या)
- बोला: “जो फल नीचे गिरे हैं, पहले उनमें से अच्छे चुन लेते हैं, सड़े-गले जानवरों के लिए छोड़ देते हैं।”
सार:
- पहला आदमी – सबसे हिंसक विचार → कृष्ण लेश्या
- आख़िरी वाला – सबसे दयालु, अहिंसक → शुक्ल लेश्या
इस कहानी से जैन धर्म सिखाता है: जैसे-जैसे हमारी सोच अहिंसा, दया और संयम की ओर बढ़ती है, हमारी लेश्या भी काली से सफेद की ओर शुद्ध होती जाती है।
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3. राजा प्रसन्नचन्द्र की कहानी में कृष्ण लेश्या
यह कहानी दिखाती है कि एक ही साधु का मन कुछ ही समय में नरक से देवगति तक बदल सकता है – सिर्फ लेश्या बदलने से।
- राजा प्रसन्नचन्द्र ने सब छोड़कर दीक्षा ली, महान मुनि बने, गहन ध्यान में बैठे थे।
- राजा श्रेणिक ने उन्हें देखा – तेजस्वी, शांत, गम्भीर ध्यान में।
- वह भगवान महावीर के पास गया और पूछा:
- भगवान महावीर ने कहा:
- राजा श्रेणिक चौंक गया –
- थोड़ी देर बाद फिर पूछा:
- भगवान बोले:
क्या बदला? बीच के समय में उस मुनि के मन में थोड़ी देर के लिए क्रोध / राग / द्वेष जैसा कृष्ण-लेश्या जैसा भाव आया, फिर वे संभल गए, पश्चाताप किया, शुद्ध भाव में आ गए – तो लेश्या भी बदल गई, और परिणाम भी बदल गया।
सीख:
- लेश्या = हमारे “अभी के” गहरे भावों की दशा
- मरते समय अगर मन कृष्ण लेश्या वाला हो (क्रूर, हिंसक, द्वेष से भरा),
- अगर मरते समय मन निर्मल, शुक्ल लेश्या के नज़दीक हो,
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4. रोज़मर्रा की छोटी-छोटी “कृष्ण लेश्या” वाली आदतें
कभी-कभी हमें लगता है “मैं तो किसी को मारता नहीं, मैं कृष्ण लेश्या वाला कैसे?” पर जैन आचार्य समझाते हैं कि कृष्ण लेश्या सिर्फ बाहरी हिंसा नहीं, भीतर के भाव भी हैं:
- किसी के सुख से जलना – “ये क्यों आगे बढ़ गया?”
- मन में बदला, घृणा, “मौका मिले तो मैं इसे बर्बाद कर दूँगा” जैसी भावना
- कमजोर पर जुल्म – नौकर, पशु, बच्चों पर क्रूरता
- जानबूझकर किसी को कष्ट देकर ख़ुशी महसूस करना
- धर्म, साधु, शास्त्र का मज़ाक उड़ाना
ऐसे भाव जितने मज़बूत होते जाते हैं, उतनी ही हमारी कृष्ण लेश्या गहरी मानी जाती है।
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5. हमें क्या करना चाहिए?
जैन धर्म का संदेश बहुत साफ़ है:
- क्रोध, द्वेष, जलन, बदला – ये सब कृष्ण लेश्या की तरफ़ ले जाते हैं
- क्षमा, करुणा, मैत्री, संयम – ये शुक्ल लेश्या की तरफ़ ले जाते हैं
इसलिए:
- गुस्सा आए, तो तुरन्त खुद को रोकें, “मैं कृष्ण लेश्या की तरफ़ जा रहा हूँ” सोचें
- रोज़ कुछ समय प्रार्थना, समायिक, स्वाध्याय में लगाएँ
- “सब जीवों के प्रति मैत्री, करुणा” का भाव बनाएँ
- मरते समय की अंतिम लेश्या कैसी होगी,
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संक्षेप में:
- कृष्ण लेश्या – सबसे नीच, काली, हिंसा और द्वेष से भरा मन
- इसकी सबसे अच्छी झलक – जामुन के पेड़ वाली कहानी का पहला यात्री,
- जैन धर्म हमें सिखाता है कि हम धीरे-धीरे