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  • parasnath tirthankar kevali ne naag nagini ko kaie namokar mantr sunya jabki vo toh acharya upadhya and sadhu ke samne jhutke nhi hai kya esa ho sakta namkar mantr shatkhandagam ke phele 2 hi pad arihant and siddh hi the baad mei 3 pad jude?
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    parasnath tirthankar kevali ne naag nagini ko kaie namokar mantr sunya jabki vo toh acharya upadhya and sadhu ke samne jhutke nhi hai kya esa ho sakta namkar mantr shatkhandagam ke phele 2 hi pad arihant and siddh hi the baad mei 3 pad jude?

    8 months ago 32

    1) पार्श्वनाथ प्रभु, नाग‑नागिनी और नमोकार मंत्र

    आपका सवाल यह है कि – जब भगवान पार्श्वनाथ केवली थे और वहाँ कोई आचार्य, उपाध्याय, साधु उपस्थित नहीं थे, तब नाग‑नागिनी ने पाँचों पद वाला नमोकार मंत्र कैसे बोल दिया?

    समझने की बातें:

    • नमोकार मंत्र किसी “व्यक्ति” के सामने झुकना नहीं है, यह “पदों/स्थानों” और गुणों को नमस्कार है –
    - अरिहन्त - सिद्ध - आचार्य - उपाध्याय - साधु
    • ये पाँचों पद पूरे लोक (विश्व) में सदैव कहीं‑न‑कहीं विद्यमान रहते हैं।
    - सिद्ध तो अनादि‑अनन्त काल से सिद्धशिला पर हैं। - साधु, आचार्य, उपाध्याय हर समय किसी‑न‑किसी देश‑काल में होते ही हैं।
    • इसलिए, उस क्षण आपके सामने आचार्य/उपाध्याय/साधु खड़े हों, ये ज़रूरी नहीं है।
    - मंत्र में हम “जहाँ कहीं भी हों, उन सभी को नमस्कार” करते हैं – “णमो लोए सव्वसाहूणं” = सारे लोक के सभी साधु‑साध्वी को नमस्कार।

    इसलिए नाग‑नागिनी द्वारा पाँचों पद वाला नमोकार मंत्र बोलना बिल्कुल शास्त्रानुसार और संभव है, उसमें कोई विरोध या असंगति नहीं है। केवल ज्ञान वाले तीर्थंकर तो सभी पदों और सभी जीवों के अस्तित्व को प्रत्यक्ष जानते हैं, इसलिए उनके सामने कोई भी जीव यदि पूरा नमोकार मंत्र बोले तो वह सिद्धांत से पूरी तरह सही है।

    ---

    2) “पहले नमोकार मंत्र में केवल २ ही पद थे?”

    आपने पूछा कि – > क्या सच में शुरू में नमोकार मंत्र के केवल २ पद (अरिहन्त और सिद्ध) ही थे, और बाद में आचार्य, उपाध्याय, साधु के ३ पद जुड़े? > और शतखंडागम के पहले ऐसा था?

    इस पर शुद्ध जैन दृष्टि से बात करें:

    • दोनों परम्पराओं (दिगम्बर और श्वेताम्बर) में आज मान्य जो मूल नमोकार मंत्र है, वह पाँच पदों वाला है:
    - णमो अरिहंताणं। - णमो सिद्धाणं। - णमो आयरियाणं। - णमो उवज्झायाणं। - णमो लोए सव्वसाहूणं।
    • जैन परम्परा में इसे अनादि (शुरू से) ही पंच‑परमेष्ठी का नमस्कार माना गया है।
    - शास्त्रों में यह नहीं कहा गया कि “पहले केवल दो पद थे, बाद में तीन जोड़ दिए गए।” - यह दावा ज़्यादातर आधुनिक चर्चाओं या अनुमान पर आधारित है, प्रमाणित आगमिक कथन नहीं है।
    • शतखंडागम
    - यह दिगम्बर सिद्धान्त‑ग्रन्थ है, जो कर्म‑सिद्धान्त आदि का अत्यन्त गूढ़ विश्लेषण करता है। - यह ग्रन्थ “नमोकार मंत्र का इतिहास” बताने वाली पुस्तक नहीं है। - यह कहना कि “शतखंडागम से पहले नमोकार में केवल २ पद थे” – जैन शास्त्रीय प्रमाण से सिद्ध नहीं है।
    • पंच‑परमेष्ठी की व्यवस्थित व्यवस्था (अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) बहुत प्राचीन है और दोनों सम्प्रदाय इसे मूल मानते हैं।
    - छोटे‑मोटे अन्तर केवल उच्चारण (savva/sabba) या व्याख्या में हैं, - पर “पहले दो पद, बाद में पाँच पद” – ऐसा मत प्रामाणिक रूप से स्वीकृत नहीं।

    आप संक्षेप में ऐसे समझें:

    • नमोकार मंत्र मूल रूप से ही पाँच‑पदों वाला माना जाता है।
    • दो‑पद वाला “कभी था, बाद में तीन जोड़ दिए” – यह बात जैन आगमों / तत्त्वग्रन्थों की स्वीकृत परम्परा नहीं है।
    • नमोकार मंत्र किसी “एक काल” से बनाया नहीं गया, बल्कि अनादि‑अनन्त, पंच‑परमेष्ठी को नमस्कार के रूप में माना जाता है।

    ---

    3) केवली और आचार्य/उपाध्याय/साधु को नमस्कार

    एक और शंका रहती है:

    > जब तीर्थंकर स्वयं सर्वश्रेष्ठ हैं, तो वे आचार्य/उपाध्याय/साधु को कैसे नमस्कार कर सकते हैं?

    इसका उत्तर भी वही है –

    • नमस्कार व्यक्ति की “पद‑श्रेणी” और “गुणों” को है,
    • और तीर्थंकर तो सभी गुणों का पूर्ण ज्ञान रखते हैं, इसलिए उनके लिए
    - अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु – इन पाँचों पदों की महिमा प्रत्यक्ष है।
    • वे किसी से “नीचे” होकर नमते नहीं, बल्कि सारे लोक‑व्यवहार और धर्म‑व्यवस्था की पूर्णता के कारण पंच‑परमेष्ठी व्यवस्था को मान्यता देते हैं।

    ---

    यदि आप नमोकार मंत्र, उसका मूल पाठ और अर्थ सरल भाषा में देखना चाहें, तो इसे यहाँ विस्तार से समझाया गया है

    सार:

    • नाग‑नागिनी द्वारा पाँच‑पद वाला नमोकार मंत्र बोलना बिल्कुल ठीक और सिद्धांत‑सम्मत है।
    • नमोकार मंत्र “पहले दो पद, बाद में पाँच पद” – यह बात जैन शास्त्रों से प्रमाणित नहीं है; परम्परा इसे आदि से ही पंच‑परमेष्ठी‑नमस्कार मानती है।

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