What have you understood by the example used for chalamane chal in ashta udeshya (first chapter, 8th lesson)?-jainism from Bhagawati Sutra
In that lesson, the example for “चलमाणे चलिए” (chalamāne chal) is used to make one simple Jain point:
> जैसे ही सही दिशा में चलना शुरू किया, निश्चय नय से माना जाता है – काम हो गया / पहुँचा गया।
कौन‑सा उदाहरण है?
पाठशाला में आम तौर पर दो तरह से समझाया जाता है (दोनों का भाव एक ही है):
- दिल्ली से कोलकाता का उदाहरण
- कोई व्यक्ति दिल्ली से कोलकाता के लिए चल पड़ा। - उसने पहला ही क़दम आगे बढ़ाया। - व्यवहार नय से कहेंगे: “वह जा रहा है, अभी पहुंचा नहीं।” - निश्चय नय से (गहरे दार्शनिक दृष्टिकोण से) कहा जाता है: “जो कोलकाता जाने के लिए चल पड़ा, उसे कोलकाता की ओर गया हुआ माना जाएगा।”
- पानी उबलने वाला उदाहरण
- पानी 1°, 2°, … 99°, 100° तक गरम होता है। - हमारी दृष्टि में 100° पर ही “उबाल आ गया” बोलते हैं, - पर सच यह है कि 1° से ही वह उबाल की यात्रा पर लग चुका है। - बिना पहले डिग्री के, 100वीं डिग्री आती ही नहीं।
“चलमाणे चलिए” से क्या समझना है?
यह सूत्र भगवती सूत्र में गौतमस्वामी के प्रश्न से जुड़ा है:
- “हे भगवन्! जो चल रहा है, क्या उसे ‘चला’ कह सकते हैं?”
- भगवान महावीर बताते हैं:
अर्थ (सरल भाषा में):
- आरंभ बहुत बड़ा है
- सच्चे भाव से मोक्ष‑मार्ग पर चलना शुरू कर दिया, - तो निश्चय नय से आप “मोक्ष की ओर गए” माने जाते हैं।
- कर्म‑निर्जरा की दृष्टि
- जैसे ही आप तप, संयम, प्रायश्चित्त, स्वाध्याय आदि शुरू करते हैं, - उसी क्षण से कर्मों का क्षय (निर्जरा) आरंभ हो जाता है।
- व्यवहार बनाम निश्चय
- व्यवहार नय: “अभी तो बस चालू किया है, पूरा कहाँ हुआ?” - निश्चय नय: “जहाँ से सही दिशा की यात्रा शुरू हुई, वहीं से ‘हो गया’ का बीज उपस्थित है।”
साधक के लिए सीख
- अच्छा काम, धर्म, संयम, स्वाध्याय – छोटा शुरू भी कर दें, तो व्यर्थ नहीं जाता।
- यह सूत्र हमें हिम्मत देता है:
मतान्तर (परंपरा अनुसार)
- श्वेताम्बर आगम में यह सूत्र भगवती सूत्र (अंग‑५) में विस्तार से आता है, और “चलमाणे चलिए” सिद्धान्त जमाली के “चलमाणे प्रचलिए” मत पर उत्तर के रूप में स्थापित किया गया है।
- दिगंबर परंपरा में भगवती सूत्र आगम के रूप में नहीं आता, पर जो सिद्धान्त है – कि आरंभित सत्क्रिया को निश्चय नय से सिद्ध/पूर्ण माना जाता है – वही तत्त्व, अनेकान्त और नय‑सिद्धान्त के रूप में उनके दार्शनिक ग्रन्थों में भी स्वीकृत है।
संक्षेप में: जो धर्म‑मार्ग पर सचमुच चल पड़ा है, उसे निश्चय नय से “चल चुका” माना जाता है – यही “चालमाणे चाल” के उदाहरण का मर्म है।
यदि आप भगवती सूत्र की संक्षिप्त जानकारी भी देखना चाहें तो इस पर एक सरल लेख उपलब्ध है: आप यहाँ और पढ़ सकते हैं