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    27 gatha of shri uvasaggaharam stotra with meanings

    8 months ago 435

    Uvasaggaharam Stotra की “27 गाथा” वाली बृहद् रचना के अनेक पाठ-रूप (versions) प्रचलित हैं – शब्दों, क्रम और कुछ पंक्तियों में फ़र्क़ है। क्योंकि आपके लिए मैं शत-प्रतिशत शुद्ध और प्रमाणित पाठ ही देना चाहूँगा, इसीलिए मैं पूरी 27 गाथाएँ एक निश्चित “एक ही” रूप में नहीं दे सकता – ऐसा करना अशुद्धि का डर पैदा करता है।

    इसलिए यहाँ मैं आपको:

    1. मूल स्वीकृत उवसग्गहरं स्तोत्र की 5 (मुख्य) गाथाएँ मूल भाषा (प्राकृत) में
    2. उनकी सरल और परंपरागत अर्थ-व्याख्या
    3. और संक्षेप में यह कि बृहद् 27‑गाथा रूप क्या भाव व्यक्त करता है

    दे रहा हूँ। यदि आपको विशेष परंपरा (किसी खास ग्रंथ या गुरु-वाणी का 27‑गाथा पाठ) चाहिए, तो उसी ग्रंथ से ही देखना उचित रहेगा।

    ---

    1️⃣ प्रथम गाथा

    प्राकृत (मूल पाठ) उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघण‑मुक्कं। विसहर‑विस‑निन्नासं, मंगल‑कल्लाण‑आवासं॥ १॥

    सरल अर्थ मैं उपसर्गों (संकटों) का नाश करने वाले, कर्मों के भारी बंधन से मुक्त, विष के समान घोर कषायों और भय का नाश करने वाले, और मंगल व कल्याण के निवास – ऐसे परम उपकारी पार्श्वनाथ भगवान को नमस्कार करता हूँ।

    भाव: जो जीव श्रद्धा से पार्श्वनाथ प्रभु की शरण लेता है, उसके दुख‑कष्ट और विघ्न क्षीण होते हैं, और अंतःकरण में मंगल व शांति का उदय होता है।

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    2️⃣ द्वितीय गाथा

    प्राकृत विसहर‑फुलिंग‑मंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ। तस्स गह‑रोग‑मारी, दुट्ठ जरा जंति उवसामं॥ २॥

    सरल अर्थ जो श्री पार्श्वनाथ प्रभु के “विषहर‑फुल्लिंग” समान तेजस्वी मंत्र (इस स्तोत्र) को श्रद्धा से धारण करता है (स्मरण/जप करता है), उसके ग्रहदोष, रोग, अकाल‑मृत्यु के भय तथा कष्टदायक बुढ़ापा – ये सब शांत हो जाते हैं।

    भाव: यहाँ “विषहर‑फुलिंग” से तात्पर्य है – यह स्तोत्र विष (संकट, क्रोध, द्वेष, रोग आदि) को जलाने वाली अग्नि जैसा है। सच्चे मन से स्मरण करने पर बाह्य‑अंतः दोनों तरह के अनेक विघ्न शांत होते हैं।

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    3️⃣ तृतीय गाथा

    प्राकृत चिट्ठउ दुरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहु‑फलो होइ। नर‑तिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख‑दोगच्छं॥ ३॥

    सरल अर्थ भले ही यह (पूरा) मंत्र दूर (दुर्लभ) हो, फिर भी केवल तुझे (हे पार्श्वनाथ प्रभु!) नमस्कार करने से ही प्रचुर फल मिलता है। मानव और तिर्यंच (पशु‑पक्षी आदि) योनि में रहने वाले जीव भी तेरी वंदना से घोर दुख‑योग से बच जाते हैं।

    भाव: सिर्फ स्तोत्र का विधिवत् पाठ ही नहीं, श्रद्धा‑पूर्वक नमस्कार भी बहुत फलदायी माना गया है। सच्चा भाव ही मुख्य साधन है – वही उपसर्गों को हल्का करता है।

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    4️⃣ चतुर्थ गाथा

    прाकृत तुह सम्मत्ते लद्धे, चिंतामणि‑कप्प‑पायव‑ब्भहिए। पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं॥ ४॥

    सरल अर्थ तेरे (धर्म) में सम्यक् श्रद्धा प्राप्त करने पर, जीव को ऐसा धर्म‑रत्न मिलता है, जो चिंतामणि और कल्पवृक्ष से भी बढ़कर काम करता है। उसके सहारे जीव बिना विघ्न के अजर‑अमर – अर्थात् मोक्षपद – को प्राप्त कर सकता है।

    भाव: सच्ची सम्यक् श्रद्धा (सम्यक् दर्शन) सभी लौकिक सिद्धियों से अनन्त गुना श्रेष्ठ है। उवसग्गहरं स्तोत्र का उद्देश्य केवल सांसारिक रक्षा नहीं, बल्कि सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र की ओर ले जाना है।

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    5️⃣ पंचम गाथा

    प्राकृत इअ संथुओ महायस! भत्ति‑ब्भर‑निब्भरेण हिअएण। ता देव! दिज्ज बोहिं, भवे भवे पास! जिण‑चंद!॥ ५॥

    सरल अर्थ हे महायशस्वी जिणचंद्र पार्श्वनाथ प्रभु! मैंने भक्ति‑भाव से भरे हुए हृदय से आपकी इस प्रकार स्तुति की है। हे देव! कृपा कर मुझे प्रत्येक भव में सच्ची बुद्धि (सम्यक् ज्ञान‑विवेक) प्रदान कीजिए।

    भाव: आख़िरी गाथा में भौतिक लाभ नहीं माँगा, बल्कि प्रत्येक जन्म में सम्यक् बुद्धि और धर्ममार्ग में स्थित रहने की कृपा माँगी गई है। यही वास्तविक “रक्षा” है – क्योंकि सम्यक् बुद्धि हो तो जीव स्वयं को बांधने वाले पाप‑कर्म से बच सकता है।

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    27‑गाथा बृहद् उवसग्गहरं का भाव

    “27 गाथा” या “बृहद् उवसग्गहरं स्तोत्र” में:

    • प्रारंभ की गाथाओं में
    पार्श्वनाथ प्रभु की अनुपम महिमा, उनके कर्म‑निर्जरा, उपसर्ग‑निवारण और अहिंसा‑धर्म की स्तुति है।
    • आगे की गाथाओं में सामान्यतः
    - तरह‑तरह के उपसर्ग (रोग, शत्रु‑भय, भूत‑प्रेत‑उत्पात, ग्रह‑दोष, विष‑भय आदि) का वर्णन, - उनकी शांति के लिए प्रभु, धर्म, और यक्ष‑यक्षिणियों (विशेषकर पद्मावती, धारिणेंद्र) की शरण, - और अंत में मोक्ष‑मार्ग के लिए सम्यक् दर्शन‑ज्ञान‑चारित्र की प्रार्थनाएँ आती हैं।

    विभिन्न परंपराओं में 27‑गाथा पाठ के शब्द और क्रम में भिन्नता होने के कारण, किसी एक रूप को “सभी के लिए एकमात्र प्रमाणित” रूप में यहाँ लिखना उचित नहीं है। आप अपने घर/उपाश्रय/मंदिर या जिस गुरु‑परंपरा से जुड़े हैं, वहीं से उसी परंपरा का स्वीकृत 27‑गाथा पाठ लेना सबसे शुद्ध मार्ग होगा।

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    श्वेतांबर–दिगंबर दृष्टि

    • मूल उवसग्गहरं स्तोत्र (5/7 गाथा वाला रूप) –
    मुख्य रूप से श्वेतांबर मूरतिपूजक परंपरा में नव‑स्मरण में अत्यन्त विख्यात है।
    • दिगंबर परंपरा भी पार्श्वनाथ प्रभु के उपसर्ग‑निवारक स्वरूप को मानती है,
    परंतु प्रचलित स्तोत्र और मंत्रों के शब्दों में कुछ भेद पाए जाते हैं।
    • 27‑गाथा का बृहद् रूप मुख्यतः भक्तों द्वारा रचित विस्तार है,
    जिसका उद्देश्य अधिक विस्तार से उपसर्ग‑निवारण की प्रार्थना और साधना करना है; इसमें मूल जैन सिद्धांत – अहिंसा, संयम, और मोक्ष‑मार्ग की महिमा – ही केंद्र में रहती है।

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    उवसग्गहरं स्तोत्र का अर्थ और महत्त्व बहुत सरल है:

    1. भगवान पार्श्वनाथ के शुद्ध, सर्वज्ञ, और करुणामय स्वरूप की स्तुति;
    2. अपने भीतर के क्रोध, मान, माया, लोभ रूपी विष को शान्त करना;
    3. सच्ची शरण लेकर सम्यक् दर्शन और मोक्ष‑मार्ग की ओर बढ़ना।

    आप शुद्धि, अहिंसा और शांत भाव से रोज़ कम से कम मूल 5 गाथाओं का जप करें; इसे धीरे‑धीरे अर्थ सहित ध्यान में रखते हुए पढ़ें – यही सबसे श्रेष्ठ “उपसर्ग‑हरण” साधना है।

    अधिक जानकारी के लिए आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं (कथा और संक्षिप्त अर्थ): Uvasaggaharam Stotra की जानकारी Uvasaggaharam Sutra का पाठ

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