give me step by step jain chaityavandan in hindi
जितना हो सके सरल, स्टेप‑बाय‑स्टेप तरीके से बता रहा हूँ। (यह क्रम मुख्य रूप से श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा में प्रचलित है। दिगंबर पद्धति अलग होती है, नीचे संक्षेप में उसका भी उल्लेख है।)
---
1. तैयारी (शुद्धि)
- स्नान कर के स्वच्छ, सादे (अच्छा हो तो सफेद) कपड़े पहनें।
- मुँह साफ करें, जूते‑चप्पल बाहर छोड़ें, मोबाइल आदि से मन हटाएँ।
- शान्त बैठ कर मन में संकल्प लें –
“आज मैं पूरे एकाग्र भाव से भगवान का चैत्यवंदन करूँगा/करूँगी, किसी को कष्ट नहीं दूँगा/दूँगी।”
---
2. मंदिर / पूजा‑स्थान में प्रवेश
- पहला निस्सिहि –
मंदिर की पहली देहली पर रुक कर मन में बोलें – “निस्सिहि, निस्सिहि, निस्सिहि” भाव: मैं बाहरी संसार की चिन्ताएँ छोड़ कर अंदर जा रहा/रही हूँ।
- मूर्ति के पास पहुँचना, दर्शन
– शान्त भाव से भगवान की प्रतिमा को देखें, राग‑द्वेष छोड़ें।
- दूसरा निस्सिहि –
गर्भगृह/मुख्य मंडप के पास फिर से निस्सिहि करें – भाव: अब केवल जिनेन्द्र‑दर्शन और आराधना ही मेरा काम है।
- प्रदक्षिणा (यदि मंदिर में हों)
– वेदी के चारों ओर 3 बार घड़ी की दिशा में घूमें, हाथ जोड़े हुए। भाव: भगवंत के गुणों के चारों ओर मैं घूम रहा/रही हूँ।
- प्रणाम
– पंचांग / अष्टांग प्रणाम करें (जमीन पर झुक कर, सिर टेक कर)। – मन में पञ्च परमेष्ठी (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) को नमस्कार करें।
---
3. आसन ग्रहण करना
- साफ पट/आसन पर बैठ जाएँ – पद्मासन, अर्ध‑पद्मासन या सीधी सुखासन।
- तीसरा निस्सिहि मन में करें –
भाव: अभी से मैं केवल सामायिक‑चैत्यवंदन में लगूँगा/लगूँगी, बीच में और कोई काम नहीं करूँगा/करूँगी।
---
4. प्रारम्भिक नमस्कार
- णमोकार मंत्र (नवकार मंत्र) –
– 3 या 9 बार श्रद्धा से बोलें। भाव: पाँच परमेष्ठी को नमस्कार कर के सारे पाप कर्मों की निर्जरा हो।
- (बहुत जगह) “चत्तारि मंगलं / मंगलिक” बोला जाता है –
– धर्म, भगवान, साधु‑साध्वी सब मंगल हैं – ऐसा स्मरण।
---
5. Iriyavahiyam (इऱियावहियं सूत्र)
- अब इऱियावहियं सूत्र बोला जाता है।
भाव: चलते‑फिरते, चलते मंदिर आने तक, जो भी छोटे‑मोटे जीवों को कष्ट हुआ हो, उसके लिए क्षमा माँगना।
---
6. Tassa Uttari (तस्स उत्तरी‑करण सूत्र)
- इसके बाद तस्स उत्तरी‑करण सूत्र बोला जाता है।
भाव: अभी‑अभी जो भी हल्की भूलें हो गई हों, उनका प्रायश्चित करके, आगे शुद्ध भाव से आराधना करने का संकल्प।
---
7. Khamasamana / Khamemi Savve Jiva (क्षमा‑भाव)
- फिर खमासमणो / खमेणि सव्वे जिवा जैसा सूत्र बोला जाता है।
भाव: – मैं सब जीवों को क्षमा करता/करती हूँ, – मुझ पर क्रोध करने वालों को भी क्षमा करता/करती हूँ, – किसी से बैर नहीं रखता/रखती।
यहाँ से मन बहुत हल्का और शांत कर लेना है।
---
8. Logassa (चौविस ठाणं – चतुर्विंशति‑स्तव)
- अब लोगस्स (Logassa) सूत्र बोला जाता है –
– इसमें 24 तीर्थंकरों की वंदना है। भाव: – सभी चौबीस तीर्थंकर भगवान, जिनका धर्म एक है, – उन सबको मैं बार‑बार प्रणाम करता/करती हूँ।
---
9. Alochana – Pratikraman (अलोचना‑प्रतिक्रमण – संक्षेप में)
घर पर छोटा चैत्यवंदन कर रहे हों तो:
- थोड़ी देर आँखें बंद कर के सोचें –
– आज या हाल में मैंने वाणी, मन, शरीर से कौन‑कौन सी गलतियाँ की?
- मन ही मन या छोटी अलोचना / प्रतिक्रमण की पंक्तियाँ बोलें (यदि आती हों),
वरना सीधा भाव रखें – “जो भी भूलें हुई हैं, मैं उन्हें स्वीकार करता/करती हूँ, उनका त्याग करूँगा/करूँगी।”
---
10. Kayotsarg (कायोत्सर्ग – स्थिर ध्यान)
- अब खड़े हो कर या बैठे‑बैठे, शरीर को एकदम स्थिर रखें – हाथ शरीर से थोड़ा अलग, आँखें हल्की बंद या ढीली।
- कुछ समय (२–५ मिनट या जितना हो सके)
– आत्मा का स्मरण, – शरीर से अलग होने का भाव, – “मैं केवल ज्ञान‑दर्शन‑आनंद‑स्वरूप आत्मा हूँ” – ऐसा चिंतन।
बहुत जगह इस अवस्था में फिर से लोगस्स या कोई अन्य कायोत्सर्ग‑सूत्र बोला जाता है।
---
11. Stuti, Prarthana, Mangal
- अब बैठ कर कोई छोटी‑सी स्तुति / स्तवन (जैसे – “जय जय जिनेन्द्र,” “दरशन करे तेरे प्रभु”, आदि) कर सकते हैं।
- अंत में मंगलपाठ / मंगलिक –
– सब जीवों का कल्याण हो, – सबको सम्यक दर्शन मिले, – विश्व में शांति हो – ऐसी प्रार्थना।
---
12. समापन
- हाथ जोड़ कर, भगवान को अन्तिम नमस्कार करें।
- मन में कहें –
“यदि इस चैत्यवंदन में मुझसे कोई मंत्र, क्रम या विधि की भूल हुई हो, तो क्षमा कीजिए।”
- धीरे‑धीरे उठकर बाहर जाएँ; तुरंत हँसी‑मज़ाक या भारी चर्चा में न लगें, शांति का भाव कुछ समय बनाए रखें।
---
दिगंबर परंपरा का संक्षिप्त उल्लेख
- दिगंबरों में “चैत्यवंदन” की विधि और सू्त्र अलग होते हैं।
- वहाँ अधिक ज़ोर होता है –
- इसलिए यदि आप दिगंबर हैं, तो अपने मठ/संघ की पद्धति के अनुसार ही सीखना ठीक है।
---
आप श्वेतांबर चैत्यवंदन की सरल विधि और सूत्रों की और जानकारी यहाँ पढ़ सकते हैं
इसी आधार पर आप रोज़ थोड़ा‑थोड़ा अभ्यास करेंगे तो पूरा चैत्यवंदन क्रम बहुत सहज हो जाएगा।