तीर्थंकर जन्मते ही क्या पहले दिक्कुमारियों के आसन कांपते हैं
जैन सिद्धांत के अनुसार
- तीर्थंकर के गर्भ–कल्याणक और जन्म–कल्याणक के समय बहुत‑से देवों के आसन (सिंहासन) हिलते हैं – विशेष रूप से इन्द्र आदि महादेवों के।
- दिक्कुमारियाँ (५६/८ दिक्कुमारी देवियाँ) उस समय प्रभु की माता की सेवा के लिए आती हैं – स्नान, शृंगार, झाड़–फानूस, चँवर आदि से पूजा करती हैं।
लेकिन
- ग्रंथों में ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि
- आसन–कम्पन सामान्य रूप से देवलोक में होने वाला एक मंगल सूचक है, किसी एक वर्ग (केवल दिक्कुमारी) के लिए “सबसे पहले” ऐसा निश्चित क्रम बताना शास्त्रीय नहीं माना जाता।
संक्षेप में: तीर्थंकर जन्म के समय देवों के आसन हिलते हैं, दिक्कुमारियाँ अवश्य आती हैं और सेवा करती हैं, पर “सबसे पहले दिक्कुमारियों के आसन ही काँपते हैं” – ऐसा विशेष नियम शास्त्रों में नहीं कहा गया है।
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