Maha shukra dav ka punya
“महाशुक्र देव” Jain cosmology में एक Devlok (स्वर्ग) है। यह 16 कल्प‑देवलोकों में से एक है, और काफी ऊँचा स्वर्ग माना जाता है (शुक्र के बाद महाशुक्र)।
1. महाशुक्र देव लोक कैसा है?
- यह ऊपरी लोक (ऊर्ध्व लोक) में स्थित एक स्वर्ग है।
- यहाँ के देवों के पास बहुत अधिक सुख‑सुविधा, आभूषण, दिव्य वाहन, सुंदर देह आदि होते हैं।
- आयु, कांति, सुख – सब साधारण मनुष्य से अनगिनत गुना अधिक माने जाते हैं।
- फिर भी यह संसार के भीतर ही है, यहाँ से भी जन्म‑मरण चलता रहता है, मोक्ष नहीं होता।
2. वहाँ जन्म पाने का पुण्य किससे बनता है? संक्षेप में – बहुत ऊँचे स्तर का शुभ कर्म (पुण्य) बनने पर जीव महाशुक्र जैसे ऊँचे देव लोकों में जन्म लेता है। ऐसा पुण्य मुख्यतः इनसे बनता है (पिछले जन्मों में):
- दृढ़ अहिंसा – किसी भी जीव को जान‑बूझकर कष्ट न देना।
- पाँच व्रतों के अनुसार जीना (गृहस्थ के लिए छोटे व्रत, अधिक संयम वाले के लिए बड़े व्रत)।
- दान – साधु‑साध्वी, उपाश्रय, जिनालय आदि की भाव से सेवा व दान।
- सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह की मर्यादा रखना।
- नियम से समायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, पूजा, तप (उपवास, अठाई, आयंबिल आदि)।
- क्रोध, मान, माया, लोभ को घटाने का सच्चा प्रयत्न।
ऐसे पुण्य के फल से जीव ऊँचे स्वर्गों जैसे – शुक्र, महाशुक्र, इत्यादि में देव बनता है।
3. ध्यान रखने योग्य बात (Jain दृष्टि से)
- Devlok का सुख बहुत ऊँचा है, पर स्थायी नहीं – पुण्य खत्म होगा तो पुन: नीचे जन्म लेना पड़ेगा।
- इसलिए आचार्यों ने कहा है –
Digambar और Shwetambar – दोनों परम्परा में महाशुक्र जैसे देवलोक को स्वीकार किया गया है; विस्तार (संख्या, मापन आदि) में थोड़े भेद हो सकते हैं, पर मूल भाव एक ही है – बहुत ऊँचा स्वर्ग = बहुत ऊँचा पुण्य, लेकिन अभी भी बन्धन वाला संसार।