माला कैसे गिनना चाहिए
जप‑माला (नवकारवली आदि) जैन मर्यादा से कैसे गिननी चाहिए, इसे बहुत सरल तरीके से समझें:
- तैयारी
- शांत, साफ जगह पर बैठें।
- हाथ‑मुँह धो लें, मन शांत करें, पंच परमेष्ठी का भाव करें।
- कौन‑सा हाथ
- परम्परा से दाहिने हाथ से माला गिनी जाती है।
- किसी शारीरिक कारण से न हो पाए तो बाएँ हाथ से भी कर सकते हैं – भाव शुद्ध होना मुख्य है।
- कैसे पकड़ें
- माला को मध्यमा उंगली (बीच वाली) पर रखें।
- अंगूठे से दाना आगे बढ़ाएँ/खींचें।
- तर्जनी (पहली उंगली) से दाने न छुएँ – उसे ऊपर की ओर या मुड़ी हुई रखें।
- “मेरु / गुरु” दाना
- ज्यादातर मालाओं में एक अलग या बड़ा दाना होता है – इसे मेरु / गुरु दाना कहते हैं।
- गिनते समय इस दाने को न गिनें और न ही इसे पार करें।
- मेरु के अगला दाना से शुरू करें, एक‑एक दाना जपते जाएँ, जब फिर मेरु तक पहुँचें तो
- जपते समय
- हर दाने पर एक पूरा मंत्र बोलें – जैसे नवकार मंत्र।
- आवाज साफ, गति मध्यम; न बहुत तेज, न बहुत धीमी।
- सामान्य संख्याएँ: 9, 27, 54 या 108 नवकार।
- ध्यान संख्या से ज़्यादा भाव, एकाग्रता और अर्थ पर हो।
- आसन और स्तर
- माला को छाती के पास या हृदय स्तर पर रखें।
- माला ज़मीन पर न लगे, न पैरों के पास घिसटे।
- आँखें हल्की बंद या नरम दृष्टि नीचे।
- मर्यादा
- जप के समय अनावश्यक बात‑चीत न करें।
- माला को दिखावा, आभूषण या फैशन की तरह न पहनें।
- जप पूरा होने पर माला को साफ कपड़े/थैली में आदर से रखें।
- दानों की संख्या का भाव
- प्रायः जैन माला में १०८ दाने होते हैं – ये पंच परमेष्ठी के १०८ गुणों का स्मरण कराते हैं (अर्हंत 12, सिद्ध 8, आचार्य 36, उपाध्याय 25, साधु 27 = 108)।
- कई मालाओं में १०८ के अलावा ३ अतिरिक्त दाने भी होते हैं – ये सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र (त्रिरत्न) की स्मृति माने जाते हैं।
- मेरु / गुरु दाना अलग होता है, उसे न गिनते हैं, न पार करते हैं।
थोड़ा और पढ़ना चाहें तो जैन माला और नवकारवली पर सरल जानकारी यहाँ देख सकते हैं