आहार परठते घाती कर्म परठनेवाले कोन है जैन धर्म के अनुसार
जैन धर्म के अनुसार “घाती कर्म” (घातिकर्म) वे हैं जो आत्मा के मुख्य गुणों को ढकते / नष्ट जैसा प्रभाव डालते हैं। ये चार हैं:
- ज्ञानावरणीय कर्म
– यह आत्मा के सच्चे ज्ञान (जानने की शक्ति) को ढकता है।
- दर्शनावरणीय कर्म
– यह सही दर्शन / सही देखने‑समझने की शक्ति को ढकता है।
- मोहनीय कर्म
– यह सम्यक्दर्शन और सम्यक्चरित्र को बिगाड़कर राग‑द्वेष, आसक्ति, क्रोध आदि पैदा करता है। – यही सबसे ज़्यादा घातक माना जाता है, क्योंकि यह आत्मा को मोहमय बना देता है।
- अन्तराय कर्म
– यह दान, लाभ, भोग, उपभोग और तप आदि अच्छे काम करने में बाधा डालता है – जैसे चाहकर भी दान न दे पाना, साधना न कर पाना आदि।
इन्हें “घाती” इसलिए कहा जाता है क्योंकि
- ये आत्मा के मुख्य गुणों (ज्ञान, दर्शन, वीर्य/शक्ति, चरित्र) पर प्रहार करते हैं।
- जब ये नष्ट हो जाते हैं, तब जीव केवलज्ञान पाकर अरिहंत बनता है और आगे सिद्ध हो जाता है।
यदि आप “कर्म बाँधने वाले कारण” पूछ रहे हों, तो
- अविरति (संयम का अभाव),
- अज्ञान/मिथ्यात्व,
- प्रमाद (लापरवाही),
- और कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ)