आठ प्रतिहार्य कौन से है in jainism
जैन धर्म में अरिहंत / तीर्थंकर भगवान के आठ प्रातिहार्य (अष्ट-प्रातिहार्य) माने गए हैं। ये वे आठ दिव्य चमत्कारी व्यवस्थाएँ हैं जो केवलज्ञान के बाद सदा भगवान के साथ रहती हैं, खासकर समवसरण में।
आठ प्रातिहार्य इस प्रकार हैं:
- भद्रासन (सिंहासन / आसन)
रत्नों से जड़ित दिव्य सिंहासन, जिस पर भगवान विराजमान होते हैं।
- चैत्यवृक्ष (अशोक / आसोपालव आदि वृक्ष)
भगवान के ऊपर बहुत विशाल, सुंदर, छाया देने वाला दिव्य वृक्ष।
- चामर
भगवान के दोनों ओर देवों द्वारा चलाए जाने वाले सफेद चामर (राजचँवर)।
- छत्र
भगवान के मस्तक के ऊपर दिव्य त्रि-छत्र (तीन स्तर वाला छत्र)।
- दिव्यध्वनि (प्रवचन की दिव्य वाणी)
भगवान के मुख से निकलने वाली ऐसी दिव्य वाणी जिसे सब जीव अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते हैं।
- पुष्पवृष्टि
देवों द्वारा सुगंधित फूलों की वर्षा।
- गन्धोदक
सुगंधित जल की वर्षा / गन्धयुक्त जल से सेवा।
- दुन्दुभि
आकाश में बजने वाले दिव्य नगाड़े / ड्रम, जो भगवान के समवसरण और देशना की घोषणा करते हैं।
इन्हें ही “अष्ट-प्रातिहार्य” कहा जाता है और ये अरिहंत परमात्मा की दिव्यता व केवलज्ञान की स्थिति को प्रकट करते हैं।